क्या आप हाई बीपी (ब्लड प्रेशर) का शिकार हैं? एलोपेथी नहीं बल्कि आयुर्वेदिक इलाज से दूर करें ये समस्या

एक समय था जब ना तो नौकरी की टेंशन थी, ना गलत खानपान की। लोग खुद को स्वस्थ रखने के लिए खुले वातावरण में घूमते थे। यदि किसी को कोई तकलीफ भी होती थी तो वह आयुर्वेदिक इलाज की मदद से ठीक हो जाते थे। आयुर्वेदिक इलाज किसी भी बीमारी को जड़ से खत्म करने में मदद करता है। ऐसे में पहले के समय में लोग आयुर्वेदिक जड़ी बूटियों का सेवन करते थे और कम ही बीमारी होते थे। लेकिन इन दिनों लोगों की लाइफस्टाइल काफी व्यस्त हो गई है। वह पूरे 24 घंटे में से खुद के लिए आधा घंटा तक भी नहीं निकाल पाते हैं। खानपान में गड़बड़ी और गलत जीवनशैली की वजह से कई तरह की बीमारियां हो रही हैं। इन्हीं में से एक बीमारी है ब्लड प्रेशर।

आजकल हर दूसरा व्यक्ति ब्लड प्रेशर का शिकार है। ज्यादातर लोग हाई बीपी यानी हाइपरटेंशन से पीड़ित हैं। हाई बीपी को कंट्रोल करने के लिए लोग एलोपेथी दवाइयों का सेवन करते हैं। लेकिन कई बार इससे भी असर नहीं होता है। आप शायद ही ये बात जानते होंगे कि अब हाई ब्लड प्रेशर का आयुर्वेदिक इलाज भी संभव है। हाई बीपी का आयुर्वेद इलाज अपनाकर लोग खुद को इस बीमारी से दूर रखने की कोशिश कर रहे हैं। लेकिन हाई बीपी का आयुर्वेदिक इलाज जानने से पहले आपको ये जानना जरुरी है कि आखिर हाई ब्लड प्रेशर होता क्या है, इसके लक्षण, कारण, क्या करें क्या ना करें आदि।

क्या होता है हाई ब्लड प्रेशर?

हाई ब्लड प्रेशर यानी हाइपरटेंशन की बीमारी बहुत घातक होती है। ये उस स्थिति में होता है जब धमनियों (arteries) में रक्त का दबाव बहुत बढ़ जाता है। वैसे तो हमारा ब्लड प्रेशर दिनभर ऊपर-नीचे होता रहता है लेकिन जब लंबे समय तक यह एक ही जैसा रहे तो यह समस्या बन सकता है। आमतौर पर ब्लड प्रेशर 140/90mmHg होता है। अगर खून का दबाव इससे ज्यादा होता है तो ये हाई बीपी माना जाता है। अगर हाई बीपी को कंट्रोल नहीं किया जाए, तो ये कई गंभीर बीमारियों को जगह दे सकता है। हाई ब्लड प्रेशर को ‘साइलेंट किलर’ भी कहा जाता है। कई बार ये हार्ट अटैक, हार्ट फेल, ब्रेन फेल, किडनी डैमेज और आंखों की समस्या जैसी बीमारियों का कारण बन सकता है।

हाई ब्लड प्रेशर के क्या लक्षण हैं?

वैसे तो कई सालों तक हाई बीपी के लक्षणों का पता नहीं चलता है। लेकिन इसके कुछ ऐसे सामान्य लक्षण हैं, जिसको ध्यान में रखकर आप बीपी की जांच करवा सकते हैं।

  • धुंधला दिखना
  • सिर घूमना
  • छाती में दर्द
  • चक्कर आना
  • सांस लेने में मुश्किल
  • अनुवांशिक
  • थकान लगना और कंफ्यूजन लग्न
  • पेशाब में खून आना
  • सिरदर्द रहना
  • नाक से ब्लड आना

हाई बीपी के कारण

  • अगर आपके परिवार में किसी को हाई बीपी की समस्या है तो इसका खतरा आपको भी हो सकता है।
  • जैसे-जैसे आपकी उम्र बढ़ती है, तो आपके ब्लड प्रेशर में भी बढ़ोतरी होती है। ऐसे में कई बार हाई बीपी का खतरा बढ़ जाता है।
  • निद्रा अपनिया (sleep apnea) के कारण भी कई बार नींद में सांस रुक जाती है। ऐसे में हाई बीपी होने लगता है।
  • किडनी की कोई बीमारी भी हाई बीपी का कारण बनती है। दरअसल, जब किडनी ठीक से काम नहीं कर पाती तो आपके शरीर में फ्लूइड ज्यादा मात्रा में बनने लगता है जो ब्लड प्रेशर को बढ़ा देता है।
  • कई बार आपका गलत खानपान भी बीपी को बड़ा देता है। ज्यादा तला हुआ, मसालेदार खाना और ज्यादा मीठे पदार्थ खाने से भी बीपी हाई होने का खतरा रहता है।
  • कई बार तनाव, गुस्सा, पॉल्यूशन और दूसरी शारीरिक समस्याएँ भी हाई बीपी की दिक्कत को बढ़ा देती हैं।

हाई बीपी होने पर क्या करें?

गहरी सांस लें

ब्लड प्रेशर हाई हो जाने पर आप तुरंत गहरी सांस लेना शुरू करें। लेकिन गहरी सांस ऐसे लें कि वो नाक से लें और मुंह से निकले। इससे आपका तनाव कम होगा और शरीर में ऑक्सीजन बढ़ेगा।

भीड़ से दूर रहें

जैसे ही आपका बीपी हाई होने लगे तो आप खुद को भीड़ से दूर कर लें। भीड़ में रहने से ज्यादा घबराहट होगी। ऐसे में दिमाग पर ज्यादा दवाब पड़ता है और हार्ट अटैक जैसी गंभीर स्थिति बन सकती है।

खुले वातावरण में बैठे

हाई बीपी होने पर आप किसी खुले वातावरण में बैठे जहां ताज़ी हवा मिल सके। साथ ही आप अपना ध्यान सभी चीजों से हटा लें और सिर्फ अपनी सांसों पर केंद्रित करें।

आँख बंद करके लेटें

यदि आपका ब्लड प्रेशर बढ़ रहा है तो आप किसी कमरे में जाकर शांति में आँखें बंद करके लेट जाएं। कुछ देर बाद आप ठंडा दूध या फिर नारियल पानी पी लें।

हाई ब्लड प्रेशर से बचाव कैसे करें?

  • नियमित रूप से संतुलित और स्वस्थ आहार लें।
  • खाने में ऊपर से नमक ना डालें।
  • खाने में नमक की मात्रा कम लें।
  • पोटेशियम युक्त भोजन करें।
  • कम फैट वाले पदार्थ को भोजन में शामिल करें।
  • फल और हरी सब्जियों का सेवन करें।
  • अपने वजन को हमेशा नियंत्रित रखें। मोटापे से हाई बीपी की समस्या होती है।
  • शराब और स्मोकिंग का सेवन करने से बचना चाहिए।
  • रोजाना की दिनचर्या में एक्सरसाइज या योग जरूर शामिल करें।

हाई ब्लड प्रेशर को कैसे करें कंट्रोल?

नमकीन फूड्स

हाई ब्लड प्रेशर सोडियम पर निर्भर होता है। यदि आप सोडियम ज्यादा खा रहे हैं तो शरीर में वॉटर रिटेंशन का कारण बनता है और इससे आपका बीपी बढ़ सकता है। पिज्जा, बर्गर, सैंडविच जैसे अन्य जंक फ़ूड से दूरी बनाकर रखें।

मीठा

हाई बीपी के मरीजों को ज्यादा मीठा खाने से बचना चाहिए। दरअसल, मीठा खाने से ब्लड शुगर का स्तर बढ़ने लगता है। आप कैंडी, कुकीज़, केक, फलों का जूस और सोडा जैसी चीजों से दूरी बनाकर रखें।

रेड मीट

हाई बीपी वालों को रेड मीट खाने से ख़तरा रहता है। दरअसल, इसमें सेचुरेटेड फैट्स और कोलेस्ट्रॉल ज्यादा मात्रा में पाया जाता है। ये दोनों सेहत के लिए नुकसानदायक होता है।

प्रोसेस्ड और पैक्ड फूड आइटम

हाई बीपी के मरीजों को प्रोसेस्ड और पैक्ड फूड आइटम से भी दूरी बनाकर रखना चाहिए। दरअसल, इन फूड्स में सोडियम की मात्रा ज्यादा होती है और इससे आपका बीपी बढ़ सकता है।

क्या हाई बीपी का आयुर्वेदिक इलाज संभव है?

चूँकि हाई ब्लड प्रेशर अब हर दूसरे व्यक्ति की समस्या बन गई है, ऐसे में आयुर्वेद ने भी इसका इलाज काफी पहले खोज निकाला है। देश में कई ऐसे संस्थान हैं जो बीमारियों को आयुर्वेदिक इलाज की मदद से ठीक करते हैं। हाई ब्लड प्रेशर से भी पीड़ित लोग अब अपनी बीमारी को ठीक करने के लिए आयुर्वेद का सहारा ले रहे हैं। हम आपको आज कुछ ऐसी आयुर्वेदिक जड़ी बूटियों के बारे में बता रहे हैं जो हाई ब्लड प्रेशर को कंट्रोल करने में मदद करती हैं।

अर्जुन छाल

अर्जुन के पेड़ से निकलने वाली छाल बहुत ज्यादा औषधीय गुणों से भरपूर रहती है। इससे कई बीमारियों का इलाज होता है। अर्जुन की छाल हाई ब्लड प्रेशर को तो कम करता ही है और साथ ही कोलेस्ट्रॉल भी कम करने में मदद करता है।

चुकंदर

वैसे तो चुकंदर हीमोग्लोबिन को बढ़ाने में काम आता है लेकिन इससे आप हाई बीपी भी कंट्रोल कर सकते हैं। चुकंदर में नाइट्रेट, पोटेशियम, फाइटोकेमिकल, और मैग्नीशियम जैसे पोषक तत्व पाए जाते हैं जो हाई ब्लड प्रेशर को कंट्रोल करने में मदद करते हैं।

त्रिफला

त्रिफला भी एक महत्वपूर्ण आयुर्वेदिक औषधि है। त्रिफला हरड़, आवला और बहेड़ा का संयोजन है, जिसके सेवन से रक्त वाहिकाओं पर पड़ने वाला दबाव कम हो जाता है। हाई बीपी को कंट्रोल करने के अलावा ये पाचन तंत्र को भी मजबूत करती है।

अश्वगंधा

अश्वगंधा जड़ीबूटी में तनाव को कम करने वाले औषधीय गुण पाए जाते हैं। इसके सेवन से बीपी हमेशा कंट्रोल में बना रहता है। साथ ही अश्वगंधा खाने से प्रतिरोधक क्षमता भी मजबूत होती है।

क्या घुटनों के दर्द ने कर दिया है जीना मुश्किल? आयुर्वेद की मदद से आप हो सकते हैं दर्द मुक्त

एक समय था जब इंसान 65 से 70 साल की उम्र तक आते-आते बीमारियां का शिकार होता था, क्योंकि तब लोग बिना मिलावट वाला भोजन करते थे। साथ ही पुराने समय में आयुर्वेदिक इलाज व्यक्ति का सहारा बनता था। आयुर्वेदिक इलाज की मदद से लोग जल्द ही स्वस्थ हो जाते थे। एक बार आयुर्वेदिक इलाज पूरा हो जाने के बाद फिर कभी बीमारी वापस लौटने का नाम नहीं लेती थी। लेकिन इन दिनों तो नौजवान लोग भी आम बीमारियों का शिकार हो रहे हैं। सबसे ज्यादा अगर किसी बीमारी की चर्चा होती है तो वो है घुटनों का दर्द। घुटने का दर्द या नी पेन काफी कॉमन प्रॉब्लम है, जो आज के समय में किसी भी उम्र के लोगों को प्रभावित कर सकता है। खासतौर से गृहणियों में घुटनों का दर्द आम समस्या बन गई है। ऐसे में वह अपने दर्द से निजात पाने के लिए कई तरह के उपचार ढूंढती हैं। लेकिन आप शायद ये बात नहीं जानते होंगे कि अब घुटनों के दर्द का आयुर्वेदिक इलाज भी संभव है।

पुरुषों की तुलना में महिलाओं को क्यों होता है घुटनों में ज्यादा दर्द?

40 से अधिक उम्र लोगों में तो घुटनों के दर्द की समस्या इन दिनों बहुत आम हो गई है। वैसे तो ये बीमारी पुरुष और महिलाएं दोनों में देखी जाती है लेकिन ज्यादातर महिलाएं ही घुटनों के दर्द का शिकार हैं। दरअसल, महिलाओं की शारीरिक संरचना की वजह से उन्हें ज्यादा घुटनों का दर्द रहता है। डॉक्टर्स के मुताबिक, महिलाओं के जॉइंट्स की मूवमेंट ज्यादा रहती है। इस वजह से उनके उनके लिगामेंट्स अधिक लचीले होते हैं। वह जितना ज्यादा मूवमेंट करती हैं उतना दर्द बढ़ता जाता है।

घुटने में दर्द के क्या कारण हैं?

वैसे तो घुटनो में दर्द की समस्या हर दूसरे व्यक्ति को होने लगी है। लेकिन इस समस्या के कई कारण हो सकते हैं। बढ़ती उम्र के साथ-साथ हड्डियां कमजोर होना, घुटने कमजोर होना, घुटनों, मांसपेशियों और नसों में सूजन होना, फिजिकल एक्टिविटी की कमी, लिगामेंट और टेंडन से अधिक काम कराया जाना, घुटनों पर शरीर का वजन आना, चोट लगना आदि घुटनों के दर्द के कई कारण हो सकते हैं। घुटनों में दर्द के कारण चलने-फिरने, उठने-बैठने से लेकर दिनभर के सभी जरुरी काम करने तक में तकलीफ होती है। इंसान मजबूर सा हो जाता है। वह कहीं आने-जाने के पहले भी सोच में पड़ जाता है।

घुटने के दर्द के क्या लक्षण हैं?

घुटनों के दर्द के लक्षण अलग-अलग तरह के होते हैं। किसी को आसानी से लक्षण समझ आ जाते हैं और कुछ लोग महीनों गुजर जाने पर भी नहीं समझ पाते। हम आपको आज घुटनों के दर्द के सामान्य लक्षण बता रहे हैं। यदि आपको भी ये लक्षण काफी समय तक नजर आए, तो आप तुरंत डॉक्टर को दिखाएं।

  • सूजन और जकड़न
  • घुटने का लाल होना
  • घुटने का गर्म होना
  • घुटने में कमजोरी महसूस होना
  • चलने में घुटने से बैलेंस न बनना
  • घुटने को पूरी तरह से सीधा करने में मुश्किल होना
  • घुटना मोड़ने में दर्द होना

कहीं आपकी ख़राब लाइफस्टाइल तो नहीं बन रही बीमारियों का घर?

आज के समय में ख़राब लाइफस्टाइल के कारण भी कम उम्र में घुटनों का दर्द होना शुरू हो गया है। इससे ना सिर्फ घुटने का दर्द बल्कि और भी कई नई-नई तरह की बीमारियां उत्पन्न हो रही हैं। जब कुछ घुटने की मांसपेशियां दूसरी मांसपेशियों की अपेक्षा ज्यादा काम करती हैं, तो घुटने पर जोर आता है। ऐसे में असंतुलन के कारण घुटनों में दर्द होना शुरू हो जाता है। इसके अलावा घुटनों में दर्द गठिया, एसीएल टूटना, फ्रैक्चर होना, आर्थराइटिस, बर्साइटिस, बैठने के गलत तरीके के कारण भी होता है।

व्यायाम करना जरूरी

घुटनों के दर्द से यदि बचे रहना है तो आपको शरीर को स्वस्थ रखना बेहद जरूरी है। शरीर को स्वस्थ रखने के लिए व्यायाम करना जरूरी है। आप चाहे तो घुटनों के दर्द से राहत पाने के लिए स्विमिंग और साइकिलिंग भी कर सकते हैं। यह आपको घुटनों के दर्द से राहत दे सकती है।

ज्यादा वजन भी नुकसानदायक

शरीर के अधिक वजन के कारण सबसे ज्यादा असर घुटनों पर पड़ता है, क्योंकि आपके घुटने ही पूरा वजन झेलते हैं। चलने-फिरने, उठने-बैठने में वही आपकी मदद करते हैं। ऐसे में आपको वजन को कंट्रोल में करना बहुत जरूरी है। इसके लिए आप एक्सरसाइज, जिम, व्यायाम आदि कर सेक्टर हैं। लेकिन जरूरत से ज्यादा व्यायाम से भी जोड़ों में दर्द होने लगता है। ऐसे में सब कुछ लिमिट में करें।

शरीर में न्यूट्रिएंट्स की कमी

कई बार शरीर में न्यूट्रिएंट्स की कमी होने लगती है और घुटनों का दर्द शुरू हो जाता है। इसलिए आप डाइट का खास ख्याल रखें। आप अपनी डाइट में रोजाना कैल्शियम और प्रोटीन को शामिल करें, खूब सारी हरी पत्तेदार सब्जियां, गोभी और ब्रोकली खाएं,संतरा, स्ट्रॉबेरी और चेरी जैसे विटामिन सी वाले फल खाएं, ढेर सारे नट्स खाएं, अदरक और हल्दी का का सेवन करें। इन सबसे आपको घुटनों के दर्द से राहत मिल सकती है।

घुटनों के दर्द से पीड़ित लोग क्या खाएं?

अचार, मिर्च-मसाले, इमली, अमचूर, सेम की फली, अरबी, आलू, गोभी, मोठ, मक्का, बेसन, सूखी सब्जियां, दही, फ्रिज का पानी, मूली न खाएं।

घुटनों के दर्द से पीड़ित लोग क्या ना खाएं?

बाजरा, मूंग, तिल, मेथी, परवल, बैंगन, एलोविरा, टिंडा, कच्ची हलदी, लौकी, गाजर, कच्चा लहसुन खाएं।

क्या घुटनों के दर्द का आयुर्वेदिक इलाज संभव है?

जोड़ो में यानी आस्टियोआर्थराइटिस के शुरुआती लक्षण में वजन कम करने, फिजियोथैरेपी और लाइफस्टाइल में बदलाव करने की सलाह दी जाती है। कई बार अगर इससे राहत नहीं मिलती तो दवाइयां दी जाती हैं। फिर भी यदि दर्द से छुटकारा नहीं मिलता तो डॉक्टर द्वारा इंजेक्शन यानी पीआरपी (प्लेटलेट रिच प्लाज्मा) दिया जाता है। बीमारी जटिल हो जाने पर ऑपरेशन कर दिया जाता है। आमतौर पर ज्यादातर डॉक्टर ऑपरेशन की ही सलाह देते हैं। लेकिन आप ऑपरेशन किये बिना भी घुटनों का दर्द काफी हद तक बंद कर सकते हैं। इसके लिए कई आयुर्वेदिक उपचार और घरेलू इलाज भी हैं। जी हां, अब घुटनों के दर्द का आयुर्वेद इलाज भी संभव है।

शहद-दालचीनी का लेप

यदि डॉक्टर आपके घुटनों को बदलने को कह दें तो आप आयुर्वेदिक लेप लगाएं। इसके लिए आप एक चम्मच शहद, एक चम्मच दालचीनी पाउडर, खाने वाला चूना आधा चम्मच लें और इन सबको मिक्स करके पेस्ट बना लें। फिर आप इसे घुटनों पर लगाएं और ऊपर से कपड़ा या बैंडेज लगा लें। इसे आठ-दस घंटों तक रहने दें।

अरंड व मेहंदी के पत्ते का लेप

अरंड व मेहंदी के पत्ते भी घुटनों के दर्द को दूर करने के काम आ सकते हैं। इसके लिए आप अरंड व मेहंदी के पत्तों को पीसकर घुटनों पर लेप करने से भी दर्द में आराम मिलता है। ये लेप बनाने में भी काफी आसान है।

इसके अलावा भी घुटनों के दर्द से निजाद पाने के लिए देश में कई संस्थाएं आयुर्वेदिक उपचार प्रदान करती हैं। इन्हीं में से एक संस्था है श्री नवग्रह आश्रम सेवा संस्थान। यह संस्थान राजस्थान के भीलवाड़ा में स्थित है। जो हर तरह की बीमारियों का आयुर्वेदिक उपचार प्रदान करता है।

गुर्दे की पथरी का आयुर्वेदिक उपचार क्या है? रुका हुआ पत्थर गलाए आयुर्वेद के माध्यम से

क्या आप भी गुर्दे की पथरी से पीड़ित हैं? गुर्दे या किडनी हमारे शरीर के महत्वपूर्ण अंग हैं जो मूत्र के रूप में हमारे शरीर से विषाक्त पदार्थों और प्रचुर मात्रा में तरल पदार्थ को बाहर निकालने का आवश्यक कार्य करते हैं। ऐसे में हम समझ सकते हैं हमारी किडनी की देखभाल करना कितना महत्वपूर्ण है।

इस ब्लॉग के माध्यम से आप गुर्दे की पथरी से छुटकारा पाने के आयुर्वेदिक उपचार के बारे में जानेंगे। मूल रूप से प्राकृतिक होने के कारण, आयुर्वेदिक उपचार काफी विश्वसनीय होते हैं और इनका कोई बड़ा दुष्प्रभाव नहीं होता है।

किडनी स्टोन क्या होता है?

गुर्दे की पथरी एक ठोस द्रव्यमान है जो गुर्दे के अंदर, विशेष रूप से मूत्रवाहिनी और मूत्राशय में खनिज और नमक के जमाव से बनी होती है। गुर्दे की पथरी विषाक्त पदार्थों के बाहर निकले में बाधा डालती है, अगर पथरी को समय पर बाहर नहीं निकाली गई तो अधिक गंभीर जटिलताएँ हो सकती हैं।

हालाँकि पथरी मूत्र पथ में बाधा नहीं डालती, इसके पत्थर मूत्र के माध्यम से शरीर से बाहर निकल जाते हैं। हालाँकि, जैसे-जैसे जमाव बढ़ता है और यह बड़े, कठोर पत्थरों का रूप ले लेता है, तब रोगी को गंभीर दर्द, रक्तस्राव और बार-बार पेशाब करने की इच्छा का अनुभव होता है।

गुर्दे की पथरी को संतुलित आहार, व्यायाम, पर्याप्त पानी पीने और आयुर्वेदिक उपचार की मदद से शरीर से बाहर निकाला जा सकता है। बड़े पत्थरों के लिए आक्रामक सर्जरी या व्यापक फ्लश थेरेपी की आवश्यकता हो सकती है।

गुर्दे की पथरी कितने प्रकार की होती है?

गुर्दे की पथरी को आकार और उसकी प्रकृति के आधार पर चार प्रकारों में वर्गीकृत किया जा सकता है।

80% मामलों में पाया जाने वाला सबसे आम किडनी स्टोन कैल्शियम ऑक्सालेट है। दुर्लभ प्रकारों में सिस्टीन स्टोन, स्ट्रुवाइट स्टोन और यूरिक एसिड स्टोन शामिल हैं।

किडनी स्टोन क्यों होता है?

कम पानी का सेवन

अपने अंगों और आंतरिक कार्यों को दुरुस्त रखने के लिए दिन में 4 लीटर पानी पीना जरूरी है। अपर्याप्त पानी पीने से विषाक्त पदार्थों को बाहर निकालना और मूत्र में खनिजों को पतला करना मुश्किल हो जाता है, जिससे गुर्दे की पथरी हो जाती है।

आरामदायक जीवन शैली

व्यायाम की कमी कई बीमारियों की जड़ है। जो लोग व्यायाम करते हैं और स्वस्थ भोजन करते हैं, उनका मूत्र मार्ग उन लोगों की तुलना में अधिक स्वस्थ होता है जो ऐसा नहीं करते हैं। ऐसे में शारीरिक क्रिया के अभाव में भी किडनी स्टोन हो जाता है।

आहार में बहुत अधिक प्रोटीन और सोडियम

अपने भोजन में अधिक प्रोटीन और नमक या सोडियम का इस्तेमाल करते हैं तो भी गुर्दे की पथरी हो सकती है। ऐसे में भोजन हमेशा संतुलित करना चाहिए।

मोटापा

मोटापा विभिन्न स्वास्थ्य जटिलताओं का कारण बनता है। जो लोग मोटे हैं उनमें गुर्दे की पथरी विकसित होने की संभावना उन लोगों की तुलना में कहीं अधिक है जो सामान्य बीएमआई स्पेक्ट्रम पर हैं।

अत्यधिक दवाइयों का सेवन

अत्यधिक दवाइयों का सेवन करने के असंख्य दुष्प्रभाव हो सकते हैं। अधिक दवाइयों के सेवन से भी किडनी को खतरा होता है, इससे किडनी स्टोन की संभावनाएं बढ़ जाती हैं।

शराब और कोक, कैफीन का सीवान

शराब, धूम्रपान, कोक और कैफीन का सेवन करने से भी किडनी स्टोन का खतरा बढ़ जाता है। यह पेय पदार्थ हमारे गुर्दे की कार्यप्रणाली को नुकसान पहुंचा सकते हैं और मूत्रवाहिनी या मूत्राशय में पथरी का कारण बनते हैं। रोजाना शराब और कैफीन का सेवन आपको लंबे समय तक निर्जलित रखता है, जिससे गुर्दे की पथरी बनती है।

किडनी स्टोन के लक्षण क्या है?

क्या आप पेट के निचले हिस्से में तेज़ दर्द का अनुभव कर रहे हैं? तो यह गुर्दे की पथरी हो सकती है, लेकिन अधिकांश बार ऐसा नहीं होता है। हम आपको किडनी स्टोन के कुछ लक्षण बता रहे हैं, जो आपको इसे पहचानने में मदद कर सकते हैं।

  • अत्यधिक दर्द
  • गुर्दे की पथरी के कारण पेट के निचले हिस्से में गंभीर दर्द हो सकता है, जो अक्सर पेट और पीठ में घूमता रहता है।
  • मूत्र के रंग और गाढ़ेपन में बदलाव
  • गुर्दे की पथरी में पेशाब झाग के साथ दुर्गंधयुक्त हो जाता है और पेशाब में खून आने के कारण रंग हल्का लाल या भूरा हो सकता है।
  • जलन
  • गुर्दे की पथरी के कारण पेशाब करते समय दर्द और जलन होती है।

गुर्दे की पथरी के अन्य लक्षण

  • दर्द के साथ मतली या उल्टी
  • पेशाब में खून आना
  • पेशाब करने में असमर्थता
  • जल्दी पेशाब आना
  • पेशाब में दुर्गंध आना और झाग दिखना

गुर्दे की पथरी आयुर्वेदिक उपचार क्या है?

पानी

गुर्दे की पथरी से प्राकृतिक रूप से उबरने के लिए हर डॉक्टर जो सबसे सरल उपाय सुझाता है वह है पानी। आपको बहुत सारा पानी पीना चाहिए, जो आपके शरीर को हाइड्रेटेड रखने में मदद करेगा और विषाक्त पदार्थों, अन्य अवांछित खनिजों को बाहर निकालने में भी मदद करेगा। पानी पथरी को मूत्र के रास्ते बाहर निकालना आसान बना देगा।

नारियल पानी

नारियल पानी सबसे स्वास्थ्यवर्धक पेय माना जाता है, जो गुर्दे की पथरी को घोलने में मदद करता है। यह गुर्दे की सभी पथरी को तोड़ने और मूत्र के माध्यम से शरीर से बाहर निकालने में मददगार है। नारियल का पानी पेशाब के दौरान होने वाली जलन से राहत दिलाने में भी सक्षम है।

भिंडी का सेवन

भिंडी, एंटीऑक्सीडेंट और एंटी-इंफ्लेमेटरी गुणों के साथ मैग्नीशियम से भरपूर होती है। भिंडी किडनी में मौजूद रसायनों के क्रिस्टलीकरण को रोकने में भी मदद करती है, इस प्रकार यह किडनी की पथरी के लिए एक उत्कृष्ट उपाय है। अपने आहार में भिंडी को शामिल करना मददगार हो सकता है क्योंकि यह गुर्दे की पथरी के लिए एक उत्कृष्ट आयुर्वेदिक उपचार है।

कुल्थी दाल

कुल्थी दाल गुर्दे की पथरी और पित्ताशय की पथरी की रोकथाम और छुटकारा दिलाने में काफी उपयोगी है। यह पथरी को छोटे टुकड़ों में तोड़ देती है, जिससे पथरी आसानी से मूत्र मार्ग से बाहर आ जाती है।

तुलसी (तुलसी के पत्ते)

तुलसी भी गुर्दे की पथरी को घलाने में सक्षम है। यह किडनी को स्वस्थ बनाए रखने में भी मदद करती है। हम चाय के साथ या अलग से तुलसी के पत्तों का सेवन कर सकते हैं।

शहद के साथ नींबू का रस

गुर्दे की पथरी के लिए सामान्य या गर्म पानी में नींबू का रस बहुत प्रभावी होता है। इसमें हम शहद और नींबू का रस मिला सकते हैं।

नींबू पथरी को तोड़ने में मदद करता है जबकि शहद गुर्दे की पथरी को बिना किसी कठिनाई के मूत्र के माध्यम से बाहर निकालने में मददगार है।

उपरोक्त के अलावा गन्ने के रस का सेवन, तरबूज, कद्दू का सूप, मौसमी का रस , छाछ, जौ का पानी, आंवला पाउडर का सेवन करने से भी गुर्दे की पथरी से छुटकारा पाया जा सकता है।

तम्बाकू छोड़ने के उपाय, तम्बाकू कैसे छोड़े,

तम्बाकू छोड़ने का निश्चय करें। दिन अभी तय करें। आप अपने आस-पास रखी तम्बाकू वाली सभी चीजों को हटा दें। समय-समय पर कोई भी ऐसा दिन पुकर्रर करें, जब आप पूरे दिन में तम्बाकू का सेवन नहीं करेंगे। तम्बाकू छोड़ने के बाद शरीर के अच्छे प्रभावों पर गौर कीजिए। जब तम्बाकू के सेवन की तलब जोर से लगे तो अपनी तलब को थोड़ी देर भुला दें। अथवा अदरक को छोटे हिस्सों में काटकर उसे सेक कर उस पर निंबू व सेंधा नमक लगाकर उसका सेवन करें। तम्बाकू के सेवन की तलब से ध्यान हटाने के लिए कोई दूसरा कार्य करें। उन जगहों पर न जाएँ, जहाँ आपका मन धूम्रपान करने/तम्बाकू चबाने के लिए ललचाए। समान विचार रखने वाले ऐसे व्यक्तियों को दोस्त बनाएँ, जो तम्बाकू छोड़ने की आपकी कोशिश में आपको प्रेरित करें। तम्बाकू का सेवन न करने से होने वाली बचत की गणना कम उम्र में कैंसर कर अपने तम्बाकू छोड़ने के फैसले को मजबूत बनाएँ। अपने फैसले को मजबूत बनाएँ। अपने फैसले पर अटल रहें। अपनी छवि को सकारात्मक बनाएँ-अगर आप तम्बाकू का सेवन छोड़ देते हैं तो यह आपकी जीत है-अपने आपको मुबारकबाद दें और फिर आप देखेंगे कि दूसरे लोग भी आपके नक्शे कदम पर चलेंगे। ध्यान रखें आप हमेशा के लिए तम्बाकू छोड़ें। तम्बाकू सेवन छोड़ने पर कुछ मामूली शारीरिक व मानसिक कठिनाई होती हैं इन कठिनाइयों को दवाइयों एवं समय-समय पर मनोचिकित्सा द्वारा समाप्त किया जा सकता है। इस सप्ताह का समय निश्चित करें और प्रथम दिन से 10 दिन तक निरतंर प्रतिदिन तम्बाकू की मात्रा कम करते जाऐं। अन्तिम 4 दिवस बिल्कुल सेवन ना करें। अपने साथ सौंफ, मिश्री, लौंग या दालचीनी रखें और तम्बाकू के सेवन की तलब होते ही इनका इस्तेमाल करें। तुलसी, अजवायन, कालीमिर्च, दालचीनी, लौंग तथा गुड़युक्त बिना दूध की चाय धीरे-धीरे चुस्की लेकर पियें।

कैंसर हैं या नहीं , निर्णय कैसे लें।

कैंसर का ईलाज जितनी जल्दी शुरू करते हैं, उतना ही नतीजा बेहतर होता है। हकीकत यह है कि कई डॉक्टर भी इस तथ्य को जल्दी स्वीकार करने से डरते हैं कि मरीज को कैंसर होने की आशंका के बारे में कैसे बताएं इसलिए वे तमाम दवा देकर देख लेते हैं, लेकिन कैंसर के टेस्ट के लिए नहीं कहते। जबकि ऐसे तमाम उदाहरण हैं जब -लगातार खांसी, मुंह के छाले, दांतों से लगातार खून आना, ये भी ओरल कैंसर के लक्षण हो सकते हैं और नहीं भी। पेशाब में खून
आना प्रोस्टेट कैंसर का लक्षण हो सकता है। कई बार किडनी में स्टोन की वजह से भी पेशाब में खून आता हैं। शरीर में गांठ जो तेजी से बढ़ रही हो। यहां इस बात का ध्यान रखें कि अमूमन जिन गांठों में दर्द हो, शुरूआत में उनमें कैंसर सेल्स के होने की आशंका कम रहती है। अगर दर्द न हो तो आशंका बढ़ जाती हैं। जैसे अगर किसी महिला के ब्रेस्ट में गांठ है और दर्द भी है तो ऐसा अमूमन हॉर्मोन की परेशानी से ऐसा होता हैं। तेजी से वजन कम होना कैंसर का सबसे विशेष लक्षण है। अगर किसी का वजन 3 महीने में 10 किलो कम हो जाए तो उसे जरूर जांच करानी चाहिए। वैसे ध्यान देने वाली बात यह है कि शुगर और टीवी के मामले में भी कई बार अचानक वजन कम होता हैं। स्प्लीन (पेट में मौजूद इस अंग के कई सारे काम हैं, लेकिन सबसे अहम काम है शरीर की सुरक्षा में भूमिका निभाना) और लिंफनोड (यह शरीर के इम्यून सिस्टम का अहम भाग है। शरीर में मौजूद बैक्टीरिया और वाइरस से लड़ने में मदद करता है)। जाड़े में भी रात में पसीना आता है सचेत हो जांए। हालांकि ऐसा दिल के मरीजों के साथ भी होता हैं। अगर किसी महिला को अपने पार्टनर के साथ संबंध बनाते समय बार-बार ब्लीडिंग हो तो डॉ. से जरूर मिल लें। वैसे, जिस महिला ने किसी के साथ फिजिकल रिलेशन नहीं बनाए हैं, उसमें सर्वाइकल कैंसर का खतरा न के बराबर होता हैं। अगर कोई शारीरिक परेशानी हो रही है और वह बार-बार हो तो यह कतई जरूरी नहीं वह कैंसर हैं। वह कोई दूसरी छोटी-मोटी बीमारी भी हो सकती है। फिर भी सतर्कता जरूरी है।

कैंसर की शुरूआत कैसे होती है ?

मानव शरीर में जब कोशिकाओं के जीन में परिवर्तन होने लगता, तब कैंसर की शुरूआत होती हैं। ऐसा नहीं है कि किसी विशेष कारण से ही जीन में बदलाव होते हैं, यह स्वंय भी बदल सकते हैं या फिर दूसरे कारणों की वजह से ऐसा हो सकता है- गुटका-तंबाकू जैसी नशीली चीजें खाने से, अल्ट्रावॉलेट रे या फिर रेडिएशन आदि इसके लिए जिम्मेदार हो सकते हैं। ज्यादातर यह देखा गया है कि कैंसर शरीर में रोग प्रतिरोधक क्षमता यानि इम्यून सिस्टम की कोशिकाओं को समाप्त कर देता है, परंतु कभी-कभी कैंसर की कोशिकाएं को इम्यून सिस्टम झेल नहीं पाता और व्यक्ति को कैंसर जैसी लाईलाज बीमारी हो जाती हैं। जैसे-जैसे शरीर में कैंसर वाली कोशिकाएं बढ़ती रहती हैं, वैसे-वैसे ट्यूमर यानि एक प्रकार की गांठ उभरती रहती हैं। यदि इसका उपचार सही समय पर न किया जाए तो यह पूरे शरीर में फैल जाता हैं।

गेंहू के ज्वारे ( वीट ग्रास ) का ज्यूस

गेहूँ के ज्वारे का रस ( व्हीट ग्रास ज्यूस )

गेहूँ के ज्वारे के रस को हरा खून भी कहते हैं, इसमें पाये जाने वाले तत्व खून में पाये जाने वाले तत्वों से काफी मिलते हैं। यह शरीर के लिये एक शक्तिशाली टॉनिक की तरह कार्य करता है। इसमें प्रचुर मात्रा में श्रेष्ठ प्रोटीन होता है। इसमें मौसमी और नारियल से भी ज्यादा विटामिन ई एवं मैगनीज पाया जाता है।
कैंसर चिकित्सा में गेहँू के ज्वारे का रस बहुत उपयोगी है, क्योंकि इसमें बीटाकैरोटिन क्लोरोफिल, लाइकोपिन, विटामिन्स (सी, ई) भरपूर मात्रा में मिलते हैं। कैंसर रोधी आहार की समुचित जानकारी रोगी को दिये जाने से रोगी को न केवल सही आहार की उपयोगिता का अंदाजा हो जाता है बल्कि शरीर की रूग्णावस्था, कमजोरी, थकान से भी निजात मिल जाती है। एंटीऑक्सीडेंट मूल रूप से कोशिकाओं की तेज सफाई को सुनिश्चित करते है, जिससे कैंसर से बचने में मदद मिलती है व शरीर की रोग प्रतिरोधक क्षमता भी बढ़ती है। एंटीऑक्सीडेंट स्वाभाविक रूप से सभी फल-सब्जियों एवं रसों में मिलता है। गेहूँ के ज्वारे के रस (व्हीट ग्रास ज्यूस) में लगभग सभी जीवनरक्षक विटामिन ए, बी, सी और ई तथा लगभग सभी खनिज (कैल्शियम्, पोटेशियम, सेलेनियम, लौह व जिंक), क्लोरोफिल, सभी पाचक तत्व एन्जाइम के रूप में और सभी उर्वरक पोषक तत्वों के साथ प्रोटीन व अमीनो एसिड प्रचुर मात्रा में मिलते हैं।

ओरल कैंसर का आयुर्वेदिक इलाज

What Are the Types & Treatment for Oral Cancer - Yashoda Hospital

 

माउथ कैंसर का आयुर्वे दिक इलाज

मुंह के कैंसर रोगी को सर्वप्रथम यह सलाह दि जाती हैं, की उसे भोजन, फल और अन्य खाने की सामग्री को खाना नहीं हैं। उसे भी लिक्वीड बनाकर पीने की सलाह देता हूं, क्योंकि मुंह के अन्दर घाव बार-बार छिलने से और साफ-सफाई पुरी नहीं होने के कारण घाव में गहरी-गहरी केवेटीज बन जाती हैं। इसके कारण रोगी का कैंसर बढ़ता जाता हैं। माउथ कैंसर के रोगी को मुख कुल्ला औषधी से दिन में 5-6 बार कुल्ला करने की सलाह दि जाती हैं, 2 चम्मच दवा 200 मी.ली. पानी में डालकर 6-7 घण्टे भीगने देने के बाद मिक्सी में ग्राइन्ड करके छान लेने के पश्चात इस पानी का इस्तेमाल कुल्ले के लिए करें। आश्रम की औषधियां रक्तशोधन 6 चम्मच, कैंसर किट 6 चम्मच का काढ़ा बनाकर आयुर्वेदीक कीमों 2 चम्मच चूर्ण शहद के साथ सेवन करने की सलाह दि जाती हैं, उपरोक्त मात्रा में इतनी ही औषधी का सेवन सांय काल भी करना हैं। हरे पत्तों का ज्यूस और हल्दी व गौमूत्र का सेवन प्रातःकाल और सांय काल नियमित रूप से सेवन करें।

Treatment of any stage of cancer disease is possible,

श्री नवग्रह आश्रम पर कैंसर चिकित्सा के दौरान कुछ ध्यान रखने योग्य हैं,

कैंसर रोग की किसी भी स्टेज का उपचार संभव हैं, उपचार में लगने वाला समय रोग की गंभीरता के हिसाब से अलग हो सकता हैं,
किसी अन्य चिकित्सा पद्धति के साथ भी आयुर्वेद का इलाज लिया जा सकता हैं, किंतु एक समय में एक ही चिकित्सा पद्धति श्रेष्ठ रहती हैं।
किमों या किसी भी थैरेपी के बाद भी आयुर्वेद से इलाज संभव हैं।
कैंसर रोग के अलावा यदि किसी अन्य प्रकार की बीमारी जैसे बी.पी., शुगर या दर्द निवारक की दवाईयां चल रही हो तो उन्हें यथावत लेते रहे, एकदम बंद
नहीं करें। इन बीमारियों के लिए भी आश्रम की आयुर्वेदिक औषधीयां लेते हुए अंग्रेजी दवाईयों की मात्रा धीरे-धीरे कम की जा सकती हैं।
नियमित समय पर रोग से संबंधित आवश्यक जाँचे करवातेे रहें।
गौमूत्र, दूध, घी एवं छाछ आदि देशी गाय का ही प्रयोग करें
रोेगी को पूर्ण आराम एवं नींद लेने देें।
रोगी की आयु और शारिरीक स्थिति के अनुसार औषधी की मात्रा को कम किया जा सकता हैं, उदाहरण के लिए यदि उल्टी हो, तो औषधी को 1दिन लिए
बन्द करके फिर से 1 चम्मच से शुरू किया जा सकता हैं, इसके अनुसार किया जा सकता हैं।
7वर्ष से कम वाले को 33ः औषध, 8-14 वर्ष तक 66ः औषध, 14से उपर 100ः औषध मात्रा की खुराक दें।

Pavtan Pavtan
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