अंडकोष कैंसर क्या होता है? जानें इसके लक्षण, कारण एवं आयुर्वेदिक उपचार

टेस्टिकुलर कैंसर (Testicular cancer) जिसे वृषण कैंसर या अंडकोष के कैंसर भी कहा जाता है। यह बीमारी पुरुषों को ही होती है, क्योंकि यह कैंसर अंडकोष का कैंसर होता है। इसलिए यह बेहद आवश्यक है कि पुरुष इसके बारे में जागरूक रहें।

यह कैंसर की गंभीर बीमारी जरूर है, लेकिन आपको इससे इतना घबराने की जरूरत नहीं है, वक्त पर यदि इसका पता चल जाए तो इसका इलाज संभव है।

अंडकोष कैंसर क्या होता है?

वृषण या अंडकोष कैंसर, अंडकोष में विकसित होता है, जिसे वृषण भी कहा जाता है, जो पुरुष प्रजनन प्रणाली का एक हिस्सा है। प्रत्येक पुरुष में दो अंडकोष होते हैं जो लिंग के ठीक नीचे अंडकोष की तरह एक थैली जैसी संरचना में मौजूद होते हैं। यह वृषण है जो शुक्राणुओं के उत्पादन और पुरुष सेक्स हार्मोन टेस्टोस्टेरोन को रिलीज करने का काम करता है। इन्हीं अंडकोष के भीतर वृषण कैंसर विकसित होता है। सबसे आम प्रकार के वृषण कैंसर शुक्राणु पैदा करने वाली कोशिकाओं में विकसित होते हैं, जिन्हें जर्म कोशिकाएं कहा जाता है।

अंडकोष कैंसर के लक्षण क्या है?

वृषण या अंडकोष कैंसर का आसानी से निदान संभव है, क्योंकि रोग के शुरुआती चरण में लक्षण दिखाई देते हैं। इस कैंसर के शुरुआती लक्षणों में एक अंडकोष में दर्द रहित गांठ या सूजन का होना शामिल है। वृषण कैंसर के अन्य लक्षण इस प्रकार है, जब वह जांघों में नहीं फैला हो।

  • अंडकोष या पेट के निचले हिस्से में भारीपन महसूस होना
  • अंडकोष में तरल पदार्थ का जमना
  • पीठ और पेट में दर्द महसूस होना
  • अंडकोष के आकार और बनावट में बदलाव

अन्य लक्षण जब वृषण कैंसर अन्य अंगों में फैल चुका हों, इसमें शामिल हैंः

  • कई मामलों में हार्मोनल बदलाव के कारण ब्रेस्ट विकसित होते हैं और दर्द होता है।
  • यदि यह फेफड़ों को प्रभावित करता है तो सांस लेने में भी दिक्कत होती है।
  • यदि कैंसर लिम्फ नोड तक फैल जाता है, तब लोअर बैक में दर्द होने की समस्या होने लगती है।
  • जब कैंसर लीवर में फैलता है, तब पेट में गंभीर दर्द होता है।
  • जब मस्तिष्क में कैंसर फैलता है, तब लगातार और कभी-कभी गंभीर सिर दर्द होता है।
  • हालांकि, कैंसर के उपचार के पूरा होने के बाद पूरी तरह से ठीक हो जाता है।

टेस्टिकुलर कैंसर के कारण

टेस्टिकुलर कैंसर या अंडकोष कैंसर के कारण अभी भी पूर्ण रूप से ज्ञात नहीं हो पाए हैं, लेकिन शोधकर्ताओं ने कुछ ऐसे कारकों, जिससे इस कैंसर को विकसित होने में सहायता मिल सकती है, उनकी पहचान की है जोकि इस प्रकार हैं:

उम्र: टेस्टिकुलर कैंसर युवा पुरुषों में अधिकतर पाया जाता है और विशेषतः यह 25 से 35 वर्ष की आयु के बीच वाले पुरूषों को अपनी चपेट में लेता है।

जेनेटिक कारण: परिवार में पुरुष को यह बीमारी यदि पहले हो चुकी है, तो संभव है कि यह कैंसर आगे भी उस परिवार के किसी अन्य पुरुष को हो सकता है।

क्रिप्टोर्चिडिज़्म (Cryptorchidism): क्रिप्टोर्चिडिज़्म का अर्थ है जन्म से पहले दोनों वृषण अंडकोश में नहीं उतरना। जिन पुरुषों में जन्म से पहले दोनों वृषण अंडकोश में नहीं उतरते हैं, ऐसे पुरुषों को भी वृषण कैंसर होने का ख़तरा अधिक होता है।

पूर्व में अनुभव: जिस किसी पुरुष को एक अंडकोष में वृषण कैंसर हो चुका है, उन्हें उनके दूसरे अंडकोष में भी यह कैंसर होने का ख़तरा बहुत अधिक होता है।

अंडकोष कैंसर का इलाज क्या है?

वृषण या अंडकोष कैंसर का उपचार भी अन्य कैंसर प्रकारों की तरह, कैंसर के चरण और उसके प्रकार पर निर्भर करता है। इस कैंसर के उपचार के विकल्पों में सर्जरी, रेडियोथेरेपी और कीमोथेरेपी आदि शामिल हैं।

अंडकोष कैंसर के उपचार में सबसे पहले आमतौर पर अंडग्रंथि की जाती है, जिसमें ऑपरेशन की मदद से प्रभावित वृषण को हटाया जाता है और यह कार्सिनोमा-इन-सीटू के मामलों में किया जाता है, जहां कैंसर अंडकोष के बाहर नहीं फैला है।

सर्जरी: वृषण या अंडकोष कैंसर में प्रभावित अंडकोष को हटाने के लिए ऑर्किएक्टॉमी सर्जिकल प्रोसीजर किया जाता है। इसके अन्तर्गत कुछ केसेस में कैंसर को फैलने से रोकने के लिए पेट में लिम्फ नोड्स को रेट्रोपेरिटोनियल लिम्फ नोड विच्छेदन सर्जिकल प्रोसीजर के माध्यम से हटाया जाता है। सर्जरी का उपयोग वृषण या अंडकोष कैंसर में प्राथमिक उपचार के रूप में किया जाता है।

रेडिएशन थेरेपी: इस थेरेपी में, ऊर्जा एक्स-रे का उपयोग कैंसर कोशिकाओं को नष्ट करने और ट्यूमर को सिकोड़ने के लिए किया जाता है। शरीर में बचे हुए कैंसर सेल्स को ख़त्म करने के लिए इस विकल्प का उपयोग सर्जरी के बाद किया जाता है। इसके अलावा रेडिएशन थेरेपी का उपयोग सेमिनोमा जैसे वृषण कैंसर के केसेस में भी किया जाता है।

सेमिनोमा : इस प्रक्रिया में प्रभावित अंडकोष पूरी तरह सर्जरी से हटा दिया जाता है। सर्जरी के बाद अन्य उपचारों का उपयोग किया जा सकता है।

कीमोथेरेपीः यह एक ऐसा विकल्प है, जो सर्जरी के बाद दवा कार्बोप्लैटिन के साथ कीमो की 1 या 2 साइकिल पर काम करता है। कई विशेषज्ञ विकिरण पर कीमो पसंद करते हैं क्योंकि इसे सहन करना आसान होता है।

अंडकोष कैंसर का आयुर्वेदिक उपचार क्या है?

वृषण या अंडकोष कैंसर, अंडकोष में विकसित होता है, जो अंडकोष में स्थित पुरुष प्रजनन ग्रंथियां हैं। अंडकोष कैंसर उन कोशिकाओं में शुरू होता है जो शुक्राणु उत्पन्न करते हैं, जिन्हें जर्म कोशिकाओं के रूप में भी जाना जाता है, लेकिन यह उन कोशिकाओं में भी शुरू हो सकता है, जो अंडकोष में हार्मोन उत्पन्न करती हैं। यह एक गंभीर स्थिति है जिसका इलाज आयुर्वेदिक तरीकों से भी किया जा सकता है।

अश्वगंधा

यह जड़ी बूटी प्रतिरक्षा-बढ़ाने वाले गुणों के लिए जानी जाती है। इसमें कैंसर रोधी गुण भी हो सकते हैं और कीमोथेरेपी के दुष्प्रभावों को कम करने और वृषण कैंसर के लक्षणों का इलाज करने में मदद कर सकते हैं।

सहजन

कहा जाता है कि मोरिंगा ओलीफ़ेरा में कुछ कैंसर-रोधी गुण हो सकते हैं, कैंसर कोशिकाओं पर इसके प्रभावों को पूरी तरह से समझने के लिए और अधिक शोध की आवश्यकता है। यह प्रभावित क्षेत्र के आसपास के प्रभाव को कम करके वृषण कैंसर का इलाज और सूजन को कम करने में मदद करता है।

तुलसी

तुलसी एक शक्तिशाली एंटीऑक्सीडेंट है और वृषण या अंडकोष कैंसर के कारण शरीर में सूजन और तनाव को कम करने में मदद कर सकता है। इसमें कैंसर रोधी गुण भी होते हैं, और यह प्रतिरक्षा प्रणाली को बेहतर बनाने में मदद कर सकता है।

नसों में जम गए हैं खून के थक्के, आज ही अपनाएं ये 5 आयुर्वेदिक उपाय

आज के समय में लोगों की ख़राब लाइफस्टाइल और खानपान ने उन्हें कई बीमारियों से घेर लिया है। इसके कारण वजन और मोटापा दोनों बढ़ने लगते हैं जो आपके शरीर में कई समस्याएं पैदा करते हैं। बात जब स्वास्थ्य और फिटनेस की आती है, तो अक्सर हम जो भी खाते हैं, उसी के साथ रहते हैं और ये नहीं ध्यान देते कि हम कैसे खा रहे हैं। ऐसे में कई बार ये गलत खानपान ही शरीर में बीमारियों को प्रवेश करने देता है। कई बीमारियों को तो इतने पैसे खर्च करने के बाद भी पूरी तरह से ठीक नहीं किया जा सकता। इन बीमारियों को बस कंट्रोल में ही रखा जा सकता है, जैसे- डायबिटीज़, मोटापा और बीपी। लेकिन इन दिनों हर दूसरे व्यक्ति को एक और समस्या जकड़ रही है और उसका नाम है ब्लड क्लॉट यानी खून का थक्का।

वैसे तो खून का थक्का बनना या ब्लड क्लॉटिंग हमारे शरीर के लिए वैसे तो फायदेमंद होता है। लेकिन यदि ये क्लॉटिंग शरीर के अंदर नसों में बननी शुरू हो जाए तो ये जानलेवा साबित हो सकती है। अगर आप भी इस बीमारी की चपेट में आ चुके हैं और डॉक्टर की मंहगी फीस और दवाइयों में अब और ज्यादा पैसे नहीं खर्च करना चाहते, तो चिंता मत कीजिए, क्योंकि हम आपको आज ब्लड क्लॉट के आयुर्वेदिक इलाज के बारे में बता रहे हैं। जी हां, आयुर्वेद में हर बीमारी का सटीक इलाज मौजूद है। ऐसे में हम आपको इस आर्टिकल में जो हेल्थ टिप्स दे रहे हैं, उन्हें आप आज से ही फॉलो करना शुरू कर दें।

ब्लड क्लॉट क्या होता है?

हमारे शरीर में रक्त वाहिनियों के जरिए खून दिल तक पहुंचता है और साथ ही ये पंपिंग के जरिए साफ होते हुए शरीर के अन्य अंगों तक पहुँचता है। इसी बहते खून में कभी-कभी क्लॉट यानी थक्का बन जाता है। लेकिन जब ये खून के थक्के लंबे समय तक बने रहते हैं तो ये सेहत के लिए हानिकारक साबित हो सकते हैं। यदि लंबे समय तक इन ब्लड क्लॉट्स का इलाज नहीं किया जाए तो ये थक्के धमनियों या नसों में चले जाते हैं और फिर ये शरीर के किसी भी हिस्से जैसे आंख, दिल, दिमाग, फेफड़े और किडनी आदि में पहुंच उन अंगों के काम को बाधित कर देते हैं। वैसे तो खून के थक्के जमना कई बार शरीर के लिए अच्छा भी रहता है। दरअसल, जब अपने आप ब्लड क्लॉट बनते हैं तो ये क्षतिग्रस्त नलिकाओं की मरम्मत करने का भी काम करते हैं। यदि ये थक्के ना बने तो चोट लगने पर शरीर में खून का बहाव रोकना बहुत ही मुश्किल हो जायेगा। शरीर में मौजूद प्लाज्मा में कई प्लेटलेट्स और प्रोटीन होते हैं जो चोट की जगह पर रक्त के थक्के निर्माण करते हैं और खून बहने से रोकते हैं। लेकिन जब ये क्लॉटिंग शरीर के अंदर नसों में होने लगती है तो खतरनाक साबित हो सकती है। इस तरह का खून का थक्का हमेशा ही अपने आप या प्राकृतिक रूप से घुलकर वापस खून में परिवर्तित नहीं होता।

कितने प्रकार के होते हैं ब्लड क्लॉट?

आमतौर पर ब्लड क्लॉट दो प्रकार के होते हैं। पहला जिसमें लगातार खून बहता है और उस जगह के खून के थक्के नहीं जमते हैं और दूसरा अप्रत्याशित तरीके से खून का थक्का जमने लगना जिसे थ्रॉम्बोसिस भी कहते हैं। ये समस्या नसों में हो सकती है। कई बार ये खून के थक्के रक्त वाहिकाओं को भी ब्लॉक कर सकते हैं, जिसके कारण शरीर में गंभीर परेशानी उत्पन्न हो सकती है। जब ब्लड क्लॉटिंग ब्रेन में होती है तो इसे ब्रेन स्ट्रोक कहते हैं। इसके कारण सिर में अचानक से बेहद तेज दर्द होता है।

हाथ या पैर में क्लॉट

जब भी कभी हाथ या पैर में कोई चोट लग जाती या किसी चीज से टकरा जाते हैं तो स्किन में ब्लड जमा हो जाता है। फिर उस जगह पर हल्की सी सूजन आ जाती है और ब्लड जमने से डार्क ब्राउन कलर हो जाता है। इस ब्लड क्लॉट को नजरअंदाज न करें क्योंकि ये आपके दिल या लंग्स तक पहुंचकर आपको नुकसान पहुंचा सकता है।

हार्ट में क्लॉट

कई बार खून के थक्के हार्ट तक पहुँच जाते हैं। ऐसे में सीने में तेज दर्द होता है, पसीना आने लगता है और साथ ही सांस लेने में तकलीफ होती है। ये सभी हार्ट में ब्लॉक के लक्षण होते हैं। इससे हार्ट अटैक आने का खतरा रहता है।

अन्य क्लॉट

हाथ-पैर में होने वाले सामान्य क्लॉट कई बार पूरी बॉडी में ट्रेवल करके लंग्स तक पहुँच सकते हैं। साथ ही पेट में इंटेस्टाइन से ब्लड ड्रेन करने वाली नर्वस से भी क्लॉट हो सकते हैं, जो शरीर के लिए खतरनाक साबित हो सकते हैं। ऐसे में यदि पेट में लगातार दर्द होता है, तो एक बार जांच जरूर करवा लें।

क्या ब्लड क्लॉट होने से जा सकती है जान?

जी हां, दरअसल, की बार ब्लड क्लॉट साइलेंट किलर का काम करता है। ये शरीर में ऐसी गंभीर मेडिकल कंडीशन पैदा कर देता है, जिसके कारण व्यक्ति डर-सा जाता है। कई बार धूम्रपान, शराब का सेवन, तंबाकू का सेवन, हाई ब्लड प्रेशर और एस्ट्रोजन जैसी कुछ दवाएं खून जमने के जोखिम को बढ़ा देती है। यदि ब्लड क्लॉट के लक्षणों को पहले ही पहचान लिया जाए तो व्यक्ति की जान जाने से बच सकती है।

ब्लड क्लॉट के लक्षण क्या हैं?

  • बहुत ज्यादा पसीना आना
  • घबराहट होना
  • कमजोरी महसूस करना
  • बार-बार हाथ-पैर सुन्न होने लगना
  • चलने में परेशानी होना
  • सिर घुमना
  • चक्कर आना
  • शरीर मोटापे का शिकार होना
  • पीरियड्स बंद यानि मेनोपॉज होना
  • सांस फूलना
  • सांस लेने में दिक्कत आदि

ब्लड क्लॉट का आयुर्वेदिक इलाज क्या है?

आयुर्वेद में हर बड़ी से बड़ी बीमारी का इलाज बताया गया है। इसी तरह ब्लड क्लॉट की समस्या का भी इलाज आयुर्वेद के पास मौजूद है। भले ही आयुर्वेदिक चिकित्सा को असर करने में समय लगता है लेकिन यह लंबे समय तक प्रभावी रहती है। साथ ही इससे शरीर में कोई साइड इफ़ेक्ट भी नहीं होते हैं। तो चलिए जानते हैं ब्लड क्लॉट के आयुर्वेदिक इलाज के बारे में।

  • ब्लड क्लॉट को खत्म करने के लिए मेधा क्वाथ का काढ़ा बनाकर सुबह-शाम पीएं।
  • चिराजीत रसायन वटी की 1 गोली रोजाना खाएं।
  • साथ ही रोजाना एक गोली अश्वगंधा वटी खाएं।
  • हद्याअमृत दिन में 2-3 बार सेवन करे।
  • गौधन अर्क को सुबह-सुबह 2 चम्मच पिएं। अगर आपको ऐसे अच्छा नहीं लग रहा है तो इसमें 1 चम्मच शहद मिलाकर पी सकते हैं।
  • रात को पानी में 4-5 लहसुन की कलियाँ भिगोकर रख दें और सुबह उठकर इसका सेवन कर लें।
  • लहसुन, प्याज, हल्दी, एलोवेरा लें और इसे धीमी आंच में पका लें। फिर आप रोजाना इसे एक चम्मच शहद में मिलाकर खा लें।
  • आप रोज लौकी के जूस का भी सेवन कर सकते हैं। इसके अलावा आप लौकी का सूप और सब्जी का सेवन करे।
  • रोजाना अर्जुन की छाल और दालचीनी का काढ़ा बनाकर थोड़ा-थोड़ा पिएं।
  • रोजाना अनार का सेवन करें।

हाइपर एसिडिटी ने कर दिया जीना मुश्किल? घर बैठे इन आयुर्वेदिक उपायों को अपनाकर पाए राहत

भारतीय भोजन की एक सबसे बड़ी खासियत होती है और वो है तेज मसाला। यहां जितने मसाले डाले जाए उतने कम हैं। ये मसाले खाद्य पदार्थ को बेहद स्वादिष्ट तो बना ही देते हैं लेकिन साथ ही ये आपके शरीर को काफी ज्यादा नुकसान भी पहुंचाते हैं। ज्यादा मसालों का सेवन करने से शरीर में कई तरह की बीमारियां उत्पन्न होने लगती हैं और इन्हीं में से एक है हाइपर एसिडिटी। ये इन दिनों आम बीमारी बन गई है जो हर दूसरे व्यक्ति को अपनी चपेट में ले लेती है। लेकिन कभी-कभी इस बीमारी की वजह से कई गंभीर बीमारियां व्यक्ति को घेर लेती हैं। ऐसे में इसे नजरअंदाज करने की जगह समय रहते इसका इलाज कर लेना चाहिए।

आमतौर पर लोग गैस और एसिडिटी की समस्या होने पर गैस्ट्रोएंटेरोलॉजिस्ट के पास जाते हैं। वहां डॉक्टर्स की फीस से लेकर दवाइयों के खर्चे तक, लंबा बिल बन जाता है। लेकिन आप ये बात नहीं जानते होंगे कि आप बेहद कम खर्च में कुछ आयुर्वेदिक जड़ीबूटियों के जरिए भी हाइपर एसिडिटी से छुटकारा पा सकते हैं। इनमें से कुछ आम जड़ीबूटी तो आपके घर में ही मौजूद रहती हैं। हम आपको आज इस आर्टिकल के जरिए हाइपर एसिडिटी क्या होती है, हाइपर एसिडिटी क्यों होती है? हाइपर एसिडिटी के लक्षण क्या हैं? हाइपर एसिडिटी से बचाव के तरीके, हाइपर एसिडिटी होने पर क्या खाएं क्या ना खाएं और हाइपर एसिडिटी के आयुर्वेदिक इलाज के बारे में बताएंगे।

हाइपर एसिडिटी क्या होती है?

आम भाषा में हाइपर एसिडिटी को पित्त कहते हैं। पित्त खाना पचाने और साथ ही पाचन तंत्र को मजबूत करने के लिए बहुत जरूरी है। लेकिन कई बार शरीर में इसका उत्पादन जरुरत से ज्यादा होने लगता है ऐसे में एसिडिटी और एसिड रिफ्लक्स जैसी कई समस्याएँ उत्पन्न होने लगती हैं।

हाइपर एसिडिटी क्यों होती है?

हाइपरएसिडिटी यानी पित्त कई कारणों से हो सकता है। मसालेदार भोजन, गर्म मसलों का अधिक इस्तेमाल, फास्ट फूड, ज्यादा तेल में तली हुई चीजें, कम पानी पीना, ओवरईटिंग आदि के कारण हाइपर एसिडिटी हो सकती है। हाइड्रोक्लोरिक अम्ल जब इसोफेगस की परत से होकर गुजरता है, तो सीने और पेट में जलन होना शुरू हो जाती है, क्योंकि ये परत हाइड्रोक्लोरिक अम्ल के लिए नहीं बनी होती है।

हाइपर एसिडिटी के सामान्य लक्षण क्या हैं?

  • छाती में दर्द
  • बदबूदार सांस
  • खांसी
  • निगलने में कठिनाई (डिस्फेगिया)
  • पेट में जलन
  • खट्टी डकार
  • जी मिचलाना
  • उल्टी
  • गले में खराश

किन कारणों से होती ही हाइपर एसिडिटी?

हाइपर एसिडिटी कई कारणों से हो सकती है जिनमें से कुछ आम कारण निम्नलिखित है।

  • खाली पेट रहना
  • खाने के तुरंत बाद लेटना
  • अनियमित भोजन करना
  • भोजन छोड़ना
  • अधिक खाना
  • मसालेदार भोजन
  • नमकीन भोजन
  • अधिक चाय या कॉफी का सेवन
  • फैटी फूड्स
  • कुछ दवाएं
  • रात में देर तक जागना
  • टेंशन लेना
  • पेप्टिक अल्सर
  • व्यायाम की कमी
  • नींद
  • तनाव के कारण
  • शराब और धूम्रपान आदि

हाइपर एसिडिटी से बचने के लिए क्या करें?

  • अधिक मिर्च मसाले वाली चीज़ें खाने से बचें।
  • अधिक गर्म कॉफी या चाय ना पीएं।
  • मासाहार का सेवन ना करें।
  • खाना खाने के बाद थोड़ा बहुत टहले।
  • नियमित रूप से व्यायाम करें।
  • मौसमी फलों का सेवन करें।
  • नीबू, संतरा, मौसम्मी और पिपरमेंट के सेवन से बचें।
  • पैकेज्ड या फ्रोजन फूड के सेवन से बचें।

Hyperacidity दूर करने के लिए क्या चीजें खाएं?

केला

केले में फाइबर अधिक मात्रा में पाया जाता है। ये पेट के लिए काफी फायदेमंद साबित होता है। साथ ही केला खाने को भी अच्छे से पचाने में मदद करता है। इसमें पोटैशियम अधिक मात्रा में पाया जाता है जो पेट में बलगम (म्यूकस) के उत्पादन को बढ़ा देता है और एसिड को बढ़ने से रोकता है। रोजाना एक पका हुआ केला खाना फायदेमंद है।

ठंडा दूध

जब आपको भयंकर एसिडिटी हो रही हो तो आप ठंडे दूध का सेवन कर सकते हैं। दूध में अधिक मात्रा में कैल्शियम पाया जाता है जो हड्डियों के लिए सुपरफूड का काम करता है। साथ ही ठंडा दूध एसिडिटी और एसिड रिफ्लक्स से हो रही जलन से राहत दिलाता है।

ठंडी छाछ

एसिडिटी छाछ एक बेहद उपयोगी एंटीडोट है। ये खाना पचाने में मदद करती है। दरअसल, छाछ प्रोबॉयोटिक है और प्रोबॉयोटिक खाने से अच्छे से पचाने में मदद करता है। डॉक्टर भी छाछ पीने की सलाह देते हैं। प्रोबॉयोटिक गैस बनने से भी रोकते हैं। इसलिए हमेशा तला हुआ या मसालेदार भोजन करने के बाद आप छाछ जरूर पिएँ।

नारियल पानी

नारियल पानी पेट में ठंडक रखता है। आप हर एक दिन छोड़कर या रोजाना भी इसका सेवन कर सकते हैं। ये गैस और एसिडिटी बनने से रोकता है। साथ ही पचव क्रिया को भी दुरुस्त रखता है।

हाइपर एसिडिटी का आयुर्वेदिक इलाज क्या है?

आयुर्वेद में हर बड़ी से बड़ी बीमारी का इलाज बताया गया है। भले ही आयुर्वेदिक चिकित्सा को असर करने में समय लगता है लेकिन यह लंबे समय तक प्रभावी रहती है। साथ ही इससे शरीर में कोई साइड इफ़ेक्ट भी नहीं होते हैं। आयुर्वेदिक इलाज में आपको सिर्फ आपके घर में मौजूद कुछ चीजों का सेवन करना होता है। इससे आप उस बीमारी से हमेशा के लिए छुटकारा भी पा सकते हैं। आइए जानते हैं हाइपर एसिडिटी के आयुर्वेदिक इलाज के बारे में।

अजवाइन

अजाइन आपको हाइपर एसिडिटी से राहत दिलाने में मदद करेगी। ये पेट में बनने वाली एसिड को कंट्रोल करती है। ऐसे में Hyperacidity होने पर आप आधा चम्मच अजवाइन में एक चुटकी नमक मिलाकर इसका गर्म पानी के साथ सेवन कर लें। ऐसा करने से आपको हाइपर एसिडिटी से राहत मिलेगी।

दालचीनी

दालचीनी भी आपको Hyperacidity से राहत दिला सकती है। इसमें कई नेचुरल एंटासिड पाए जाते हैं, जो पेट में बनने वाले एसिड को रोकने में मदद करते हैं। साथ ही दालचीनी के सेवन से पाचन शक्ति भी मजबूत होती है। आप दालचीनी के पाउडर को शहद में मिलाकर इसका सेवन कर सकते हैं।

अंजीर

अंजीर भी Hyperacidity से राहत दिलाने में मदद करती है। इसमें विटामिन ए, विटामिन सी, विटामिन के, कॉपर, जिंक, पोटैशियम और आयरन जैसे और भी कई पोषक तत्व मौजूद होते हैं। रोजाना अंजीर के सेवन से पेट में गैस, कब्ज और हाइपर एसिडिटी की समस्या से बहुत जल्द राहत मिलती है। आप रात में एक ग्लास पानी भरकर उसमें दो सूखे अंजीर भिगो दें और अगले दिन सुबह उठकर उसका पानी पी लें और अंजीर को अच्छे से चबाककर खा लें।

इसके अलावा कुछ आयुर्वेदिक चूर्ण और औषधियां ऐसी हैं जो परेशानी से आपको रहत दिलवाएगी वो औषधियां इस प्रकार हैं

  1. अविपत्तिकर चूर्ण
  2. सुतशेखर रस
  3. कामदुधा रस
  4. मौक्तिक कामदुधा
  5. अमलपित्तान्तक रस
  6. अग्नितुण्डि वटी
  7. फलत्रिकादी क्वाथ पंचकर्म चिकित्सा
  8. हरड़ का चूर्ण
  9. त्रिफला चूर्ण

आज के समय में यूं तो विभिन्न चिकित्सा पद्धतियों में हाइपर एसिडिटी के कई इलाज मौजूद हैं लेकिन राजस्थान के भीलवाड़ा के रायला ग्राम स्थित ‘श्री नवग्रह आश्रम‘ आयुर्वेदिक पद्धति से उपचार के लिए जाना जाता है। यहां पर कई प्रकार के रोगों का उपचार आयुर्वेदिक पद्धति से किया जाता है, जिसमें हाइपर एसिडिटी भी एक है।

अगर आप हाइपर एसिडिटी की समस्या से परेशान है तो नवग्रह आश्रम अवश्य जाना चाहिए।

क्या लिवर सिरोसिस का आयुर्वेदिक जड़ीबूटियों से इलाज संभव है?

दुनियाभर में कई ऐसी बीमारियां फ़ैल चुकी हैं जिसकी आपको और हमें भनक तक नहीं लगती है। इनमें से कुछ बीमारियों के तो कभी नाम भी नहीं सुने होते हैं, लेकिन ये बीमारियां आपके शरीर में फैलती जाती है। खराब दिनचर्या, अस्वस्थ खानपान और तनाव के कारण हमारे शरीर में बीमारियां उत्पन्न होने लगती हैं। खासतौर से इन बीमारियों का प्रभाव लिवर में कई तरह की बीमारियां उत्पन्न होने लगती हैं। इन्हीं में से एक बीमारी है लिवर सिरोसिस, जो एक बेहद ही एक घातक बीमारी है। एक रिपोर्ट के मुताबिक, हर साल करीब 7-8 लाख लोग इस बीमारी के चपेट में आते हैं। इस बीमारी के चलते व्यक्ति का लिवर धीरे-धीरे काम करना बंद कर देता है। अंत में ऐसी स्थिति आ जाती है कि लिवर ट्रांसप्लांट के अलावा और कोई विकल्प नहीं बचता है। ऐसे में जिन लोगों की आर्थिक स्थिति कमजोर रहती है, वो मजबूरन लिवर ट्रांसप्लांट नहीं करवा पाते हैं। वैसे तो लिवर सिरोसिस को लाइलाज बीमारी कहा जाता है लेकिन यदि इसका सही इलाज हो जाए तो ये किसी चमत्कार से कम नहीं होता है। सही समय पर सही उपचार अपनाकर इस बीमारी के गंभीर परिणामों से बचा जा सकता है। हम आपको आज कुछ ऐसे घरेलू आयुर्वेदिक इलाज के बारे में बता रहे हैं, जिन्हें अपनाकर आप इस बीमारी को कुछ हद तक कम कर सकते हैं।

क्या होता है लिवर सिरोसिस?

इस बीमारी में लिवर बुरी तरह से डैमेज हो जाता है। इसे स्थिति को क्रॉनिक लिवर डिजीज कहते हैं। डॉक्टर्स के मुताबिक, जब क्रॉनिक लिवर डिजीज होती है तो लिवर के टिश्यू काम करना बंद कर देते हैं। बता दें लिवर के टिश्यू संक्रमण से लड़ने, ऊर्जा संचरण, टिश्यू प्रोटीन निर्माण, रक्त के शुद्धिकरण और साथ ही पाचन तंत्र को मजबूत करने में बेहद अहम भूमिका निभाते हैं। स्वास्थ्य विशेषज्ञों का कहना है कि, जिस भी व्यक्ति को लिवर सिरोसिस बीमारी होती है, उनकी रोग-प्रतिरोधक क्षमता अन्य मरीजों की तुलना में ज्यादा कमजोर हो जाती है। इस बीमारी में मरीज के लिवर की बहुत सारी कोशिकाएं नष्ट हो जाती हैं और उनकी जगह फाइबर ले लेता है। साथ ही लिवर का शेप भी बिगड़ने लगता है। इस बात से ही आप ये अंदाजा लगा सकते हैं कि लिवर सिरोसिस कितनी खतरनाक बीमारी है। सिरोसिस की वजह से जब लिवर को नुकसान पहुंचता है, तो उसे वापस ठीक नहीं किया जा सकता। समय पर इस बीमारी की पहचान कर यदि इलाज शुरू कर दिया जाए तो इससे शरीर को ज्यादा नुकसान नहीं होता है।

लिवर सिरोसिस होने के क्या कारण हैं?

लिवर सिरोसिस बीमारी होती क्या है, ये तो आपने जान लिया है, लेकिन इससे भी ज्यादा जरूरी ये जानना है कि आखिर ये बीमारी होती क्यों हैं। तो हम आपको बता दें कि लिवर सिरोसिस बीमारी हेपेटाइटिस और ज्यादा शराब के सेवन से हो सकती है। इससे शरीर में इन्फेक्शन हो जाता है और लिवर सेल्स पर निशान पड़ जाते हैं। ऐसे में सिरोसिस ख़राब होने लगता है और काफी सारे सेल्स पर निशान दिखने लगते हैं, जिससे लिवर को अपना काम करने में मुश्किल होने लगती है।

लिवर सिरोसिस के लक्षण क्या हैं?

  • थकावट (या थकान) महसूस होना
  • कमजोरी आना
  • कम या बिलकुल भूख न लगना
  • वजन कम होना
  • लिवर पर सूजन आना
  • हथेलियों का लाल होना
  • त्वचा और आंखों का पीला हो जाना
  • ब्राउन या गहरे पीले रंग की पेशाब होना
  • बाल झड़ना
  • त्वचा और बेली बटन के करीब में रक्त वाहिकाओं में बदलाव
  • पुरुषों में ब्रेस्ट का साइज़ बढ़ने लगना
  • डायरिया
  • मेंटल कन्फूजन बढ़ना
  • पेट में पानी भरना
  • पेट और पैरों में सूजन आना
  • पाइल्स की बीमारी होना

लिवर सिरोसिस का आयुर्वेदिक इलाज क्या है?

आयुर्वेदिक इलाज पद्धति हजारों वर्षों से चली आ रही है। आयुर्वेद में हर बड़ी से बड़ी बीमारी का सफल इलाज बताया गया है। इसी तरह लिवर सिरोसिस जैसी घातक बीमारी का भी इलाज आयुर्वेद के पास मौजूद है। इन दिनों एलोपेथी इलाज के बढ़ने से लोग आयुर्वेदिक इलाज पर ध्यान ही नहीं दे रहे हैं। लेकिन आप ये बात नहीं जानते होंगे कि आयुर्वेदिक इलाज द्वारा बीमारी को कम किया जा सकता है। हम आपको घर में मौजूद उन आयुर्वेदिक औषधियों के बारे में बता रहे हैं, जो लिवर सिरोसिस को ठीक करने में मदद करेंगी। आइए जानते हैं लिवर सिरोसिस के आयुर्वेदिक इलाज के बारे में।

हल्दी

हल्दी में कई चमत्कारी गुण होते हैं। आप शायद ही ये बात जानते होंगे कि हल्दी हमारे लीवर में होने वाले रैडिकल डैमेज की मात्रा को कम करती है। हल्दी अन्य पारंपरिक दवाओं की तुलना में दर्द से राहत दिलाने में ज्यादा असरदार मानी जाती है। हल्दी फैट को पचाने में मदद करती है और साथ ही शरीर में पित्त का निर्माण करती है, जो हमारे लीवर के लिए प्राकृतिक डीटॉक्सिफायर का काम करता है।

एलोवेरा और आंवला का जूस

एलोवेरा और आंवला का जूस सिरोसिस से होने वाले लिवर डैमेज को कंट्रोल करने में काफी मदद करता है। आयुर्वेदिक विशेषज्ञों के मुताबिक, रोजाना सुबह खली पेट 5-5ml एलोवेरा और आंवले के जूस को मिलाकर पीने से काफी राहत मिल सकती है।

अर्जुन की छाल

अर्जुन का पेड़ औषधीय गुणों से भरपूर होता है। ये कई बीमारियों को ठीक करने में मदद करता है। अर्जुन की छाल का इस्तेमाल सदियों से आयुर्वेदिक दवा के रूप में किया जा रहा है। आयुर्वेदिक विशेषज्ञों के अनुसार, लिवर सिरोसिस में भी इसके सेवन से बहुत फायदा मिलता है। ऐसे में लिवर सिरोसिस के मरीज हर रोज दिन में दो बार सुबह और रात में अर्जुन की छाल को पानी में अच्छे से उबालकर इसे आधा गिलास पिएँ, इससे काफी आराम मिलेगा।

पपीता

पपीता पाचन के लिए सबसे अच्छा फल माना जाता है। जो भी व्यक्ति लिवर सिरोसिस से पीड़ित है, वह रोजाना ताजा पपीते का सेवन करे। ना सिर्फ पपीता बल्कि इसके बीज भी स्वास्थ्य के लिए काफी फायदेमंद साबित होंगे। यदि आप अपने लिवर को स्वस्थ रखना चाहते हैं तो पपीते का रस निकालकर इसमें नींबू को मिक्स करके फिर इसका सेवन करें। इससे मरीज को काफी आराम मिलेगा।

सेब

सेब ऐसा फल है जिसका रोजाना सेवन करने से आप हर बीमारी से दूर रहेंगे। इसमें पेक्टिन (Pectin ) होता है, जो पाचन तंत्र से विषाक्तता को कम करके लिवर को स्वस्थ रखने में मदद करता है। ऐसे में आप रोजाना अपनी डाइट में दो सेब शामिल करें। ये लिवर सिरोसिस से आराम दिलाने में प्रभावी हो सकता है।

तुलसी दल

तुलसी भी औषधीय गुणों से भरपूर पौधा है। तुलसी के पत्तों में हेपाटो प्रोटेक्टिव गुण मौजूद होता है, जो हमारे लिवर को ख़राब होने से बचाता है। ऐसे में लिवर सिरोसिस के मरीजों को रोजाना तुलसी के पत्तों से बनी चाय या जूस पीना चाहिए।

मुलेठी

वैसे तो मुलेठी का सेवन गले को ठीक करने के लिए किया जाता है लेकिन ये पेट से संबंधित समस्याओं को भी दूर करने में मदद करती है। इतना ही नहीं मुलेठी लिवर से संबंधित समस्याओं को भी दूर करती है। इसमें एंटी इंफ्लेमेटरी गुण और ग्लिसराइजिक एसिड मौजूद होता है जो हमारे शरीर की इम्युनिटी को तेजी से बढ़ाता है। ऐसे में लिवर से संबंधित मरीजों के लिए मुलेठी का सेवन करना काफी फायदेमंद साबित होगा।

त्रिफला

त्रिफला भी एक बेहद ही चमत्कारी और शक्तिशाली आयुर्वेद जड़ी-बूटी मानी जाती है। इसके औषधीय गुण लिवर के लिए फायदेमंद होते हैं। लिवर की बीमारी से ग्रसित मरीज रोजाना रात में एक गिलास पानी के साथ एक चम्मच त्रिफला का सेवन लिवर डैमेज को कम करने का काम करता है।

पिप्पली

पिप्पली का उपयोग भी एक बेहतरीन आयुर्वेदिक औषधि के रूप में किया जाता है। ये कई बड़ी बीमारियों को ठीक करने में कारगर साबित होती है। लिवर से जुड़ी बीमारियों में आराम पाने के लिए पिप्पली का सेवन किया जाता है। पिप्पली में पिपरिन, ग्लूकोसाइड्स और पिपलार्टिन मौजूद होता है, जो हमारे लिवर को मजबूत बनाने में मदद करता है। साथ ही ये इम्युनिटी को भी बेहतर बनाता है।

अस्थमा ने कर दिया है सांस लेना मुश्किल? आयुर्वेदिक उपचार से जड़ से खत्म करें बीमारी

दुनियाभर में कई ऐसी बीमारियां हैं जिसके होने पर इंसान को भनक भी नहीं लगती है और फिर धीरे-धीरे वह बीमारी गंभीर होती चली जाती है। हमारे देश में दिन-प्रतिदिन वायु प्रदुषण भी बढ़ता जा रहा है, जिससे सांस संबंधित बीमारियां बढ़ती जा रही हैं। इन्हीं में से एक बीमारी है अस्थमा। आज के समय में इस बीमारी ने हर दूसरे व्यक्ति को जकड़ रखा है। अस्‍थमा को श्‍वास रोग के नाम से भी जाना जाता है। अस्थमा सांस लेने में कठिनाई पैदा करता है, इस वजह से व्यक्ति को घबराहट होने लगती है। अस्थमा में श्वास नलियों की सूजन और अकड़न आ जाती है और फिर श्वसनमार्ग संकुचित हो जाता है। अस्थमा से फेफड़े काफी ज्यादा प्रभावित होते हैं। सरकारी रिपोर्ट के मुताबिक, भारत में 17।23 मिलियन यानी करीब 1 करोड़ 72 लाख से अधिक अस्थमा रोगी हैं। आमतौर पर अस्थमा के मरीज इस बीमारी का इलाज एलोपैथी के जरिए करवाते हैं। लेकिन आयुर्वेद में भी अस्थमा का सटीक इलाज मौजूद है। हम आपको आज इस आर्टिकल के माध्यम से अस्थमा क्या होता है, अस्थमा क्यों होता है, अस्थमा कितने प्रकार का होता है, अस्थमा के लक्षण क्या हैं, अस्थमा से बचाव के तरीके और अस्थमा के आयुर्वेदिक इलाज के बारे में बता रहे हैं। ये सभी जानकारी पाने के लिए आप आर्टिकल तो अंत तक जरूर पढ़ें।

अस्थमा क्या होता है?

अस्थमा के बारे में बाकी सब चीजें जानने से पहले आपको ये जानना जरूरी है कि आखिर अस्थमा होता क्या है? दरअसल, जब भी हम मुंह या नाक से सांस अंदर लेते हैं, तो ये गले के जरिए नीचे जाती है और फिर एयरवेज के जरिए फेफड़ों तक पहुँचती है। फेफड़ों के अंदर बहुत से छोटे-छोटे वायुमार्ग यानी एयरवेज होते हैं, जो हवा से ऑक्सीजन लेते हैं और उन्हें रक्त प्रवाह में पहुंचाने में मदद करते हैं। जब उस वायुमार्ग में सूजन आ जाती है, तब अस्थमा के लक्षण दिखने लगते हैं। इसके कारण आसपास की मांसपेशियों में भी तनाव आ जाता है। फिर वायुमार्ग में बलगम भर जाता है। इससे यहां से जो हवा गुजरती है, उसकी मात्रा में कम हो जाती है। ऐसे में अस्थमा का अटैक आता है और खांसी और छाती में जकरण भी महसूस होने लगती है।

अस्थमा होने के क्या कारण हैं?

वैसे तो अस्थमा होने के कई कारण हैं, लेकिन इनमें से कुछ प्रमुख कारण के बारे में हम आपको बता रहे हैं।

  • जो माता-पिता अस्थमा से ग्रसित होते हैं, उनके बच्चों को भी ये बीमारी होने की संभावना ज्यादा रहती है।
  • जिन भी लोगों को बचपन में वायरल इन्फेक्शन का ज्यादा खतरा रहता था, उन्हें भी अस्थमा होने का खतरा बना रहता है।
  • धुएं, कोहरा या फिर धूल व मिट्टी इत्यादि के लगातार संपर्क में आने से अस्थमा हो सकता है।
  • श्वसन नलिकाओं में इंफेक्शन भी अस्थमा होने का एक कारण है।
  • तेज-तेज चलने से भी कई बार अस्थमा की तकलीफ होने लगती है।
  • कई बार असहनीय पदार्थ के सेवन के कारण भी अस्थमा की तकलीफ हो सकती है।

अस्थमा कितने प्रकार का होता है?

अस्थमा के अलग-अलग लक्षण के कारण इस बीमारी का वर्गीकरण किया गया है, जो इस प्रकार है।

सीजनल अस्थमा – इस प्रकार का अस्थमा पूरे साल नहीं होता बल्कि ये एक विशेष मौसम में ही मरीज को प्रभावित करता है।
अकुपेशनल अस्थमा – जो लोग किसी भी प्रकार के कारखाने में काम करते हैं, वो इस प्रकार के अस्थमा से ज्यादा प्रभावित होते हैं।
नॉन एलर्जिक अस्थमा – जब कोई व्यक्ति ज्यादा टेंशन में रहता है, या फिर उसे हमेशा सर्दी-जुकाम रहता है, वो नॉन एलर्जिक अस्थमा कहते हैं।
एलर्जिक अस्थमा – जब किसी तेज गंध, या चीज़ से व्यक्ति को एलर्जी हो जाती है, तो उसे एलर्जिक अस्थमा कहते हैं।

अस्थमा के लक्षण क्या हैं?

  • बलगम वाली खांसी या सूखी वाली खांसी
  • हंसते समय या व्यायाम करते समय छाती में जकड़न होना
  • सांस की तकलीफ होना
  • बात करने में दिक्कत होना
  • बार-बार घबराहट होना
  • थकान होना
  • छाती में दर्द
  • तेज-तेज सांस लेना
  • बार-बार इन्फेक्शन होना
  • नींद आने में परेशानी होना
  • बेचैनी या घबराहट
  • सांस लेने में मुंह से सीटी जैसी आवाज निकलना
  • खांसते समय गले में दर्द होना

अस्थमा का अटैक आने के मुख्य कारण क्या हैं?

  • रेस्पिरेटरी इंफेक्शन जैसी स्वास्थ्य स्थितियां
  • एक्सरसाइज
  • एनवायरमेंटल इरिटेंट
  • एलर्जी
  • इंटेंस इमोशन्स
  • एक्ट्रीम वैदर कंडीशन
  • पेस्ट्स (कीट)
  • एस्पिरिन या नॉनस्टेरॉइडल एंटी-इंफ्लेमेटरी ड्रग्स (NSAIDs) सहित कुछ अन्य दवाएं लेना

अस्थमा के मरीजों को किन चीजों से परहेज करना चाहिए?

यदि अस्थमा के मरीज खाने-पीने का खास ध्यान ना रखें तो ये बीमारी बढ़ती ही जाती है। ऐसे में हम आपको आज उन चीजों के बारे में बता रहे हैं जो आपको खाने में परहेज करना चाहिए।

  • पैकेटबंद फूड
  • अल्कॉहल और अचार
  • मूंगफली
  • ठंडी चीज
  • ज्यादा तली हुई चीजें

अस्थमा का आयुर्वेदिक इलाज क्या है?

यदि आप भी अस्थमा बीमारी के शिकार हैं, तो आपको काफी ज्यादा सतर्क रहने की जरूरत है। दरअसल, अस्थमा के रोगियों को अटैक आने का खतरा काफी ज्यादा रहता है, ऐसे में ये आपके लिए घातक भी हो सकता है। अगर आपको सांस लेने में दिक्कत हो रही है और मौसम के साथ-साथ समस्याएँ बढ़ती जा रही हैं तो हम आपको आज कुछ ऐसे साधारण घरेलू आयुर्वेदिक उपचार के बारे में बता रहे हैं, जो अस्थमा के खतरे को कम कर सकते हैं।

हर्बल टी

अस्थमा के असर को कम करने के लिए आप रोजाना अलग-अलग जड़ी बूटियों से बनी हुई हर्बल टी का सेवन कर सकते हैं। जिस हर्बल टी में अजवायन, तुलसी, काली मिर्च और अदरक होती है, वो अस्थमा के रोगियों के लिए काफी असरदार रहती है। इसके नियमित सेवन से कफ की समस्या कम होती है।

लहसुन

लहसुन भी अस्थमा के इलाज में काफी कारगर साबित हुआ है। रोजाना 30 मि।ली। दूध में लहसुन करीब 5 कलियाँ उबालकर इसका सेवन करने से अस्थमा जड़ से खत्म हो सकता है।

अजवाइन

अजवाइन भी अस्थमा के इलाज में काफी बेहतर साबित होती है। आप पानी में अजवाइन डालकर इसे अच्छे से उबाल लें और फिर इसकी भाप लें, इससे सांस लेने में तकलीफ दूर हो जाएगी। इसके अलावा यदि आप अजवायन के बीज और लौंग की समान मात्रा का 5 ग्राम चूर्ण प्रतिदिन खाते हैं तो भी ये आपको काफी फायदा पहुंचाएगा।

आंवला पाउडर

रोजाना 2 चम्मच आंवला पाउडर में 1 चम्मच शहद मिलाकर यदि सुबह खाली पेट इसका सेवन करेंगे तो इससे अस्थमा कंट्रोल में रहेगा।

पीपल के पत्ते

अस्थमा को ठीक करने के लिए पीपल के पत्ते भी काफी फायदेमंद होते हैं। आप इन्हें सुखाकर जला लें और फिर छानकर शहद मिला लें। इसके बाद दिन में इसे 3 बार चाट लें, इससे कुछ ही दिनों में अस्थमा की समस्या दूर हो सकती है।

अडूसा की पत्तियां

अडूसा की पत्तियां भी अस्थमा का इलाज करने में काफी फायदेमंद होती हैं। यदि इसे रोजाना मरीज को दिया जाए तो काफी जल्दी आराम मिलता है। अडूसा शरीर में जाकर फेफड़ों में जमी कफ और गंदगी को बाहर निकालता है।

अंजीर

अंजीर का सेवन करने से कफ जमना बंद हो जाता है। रोजाना एक अंजीर को गर्म पानी में भिगोकर रख दें और सुबह खाली पेट अस्थमा के मरीज इसका सेवन करें। इससे सांस की नली में जमा हुआ बलगम बाहर निकलने लगता है और इन्फेक्शन फैलने से रुक जाता है।

हल्दी

औषधीय गुणों से भरपूर हल्दी कई बीमारियों को दूर करने में मददगार साबित होती है। हल्दी में पाए जाने वाले सबसे शक्तिशाली तत्व की वजह से ही इसका रंग पीला होता है। दरअसल, हल्दी में मौजूद औषधीय और एंटीऑक्सीडेंट घटक सूजन को रोकने की क्षमता रखते हैं। ऐसे में ये अस्थमा में भी असरदार साबित होते हैं। आप रोजाना हल्दी पाउडर का चाय या पानी के साथ सेवन कर सकते हैं।

यूरिक एसिड बढ़ने के क्या है लक्षण और कारण? जानें इसे कंट्रोल करने के आयुर्वेदिक उपाय

आज के समय में हर दूसरा व्यक्ति गलत लाइफस्टाइल और अनहेल्दी खानपान होने की वजह से कई तरह की बीमारियों की चपेट में आ रहा है। कुछ तो ऐसी भी बीमारी होती हैं जिनके बारे में ज्यादातर लोग जानते तक नहीं हैं। ऐसी ही एक बीमारी है यूरिक एसिड। Uric acid शरीर में एक तरह का गंदा पदार्थ होता है जो हमारे खून में जमा होना शुरू हो जाता है। इसके कारण शरीर के कई हिस्सों में दर्द होने लगता है।  यूरिक एसिड के बढ़ने से ज्यादातर जोड़ों में दर्द, घुटनों में दर्द जैसी परेशानी का सामना करना पड़ सकता है। वैसे तो बाजार में बढ़े हुए Uric acid को कम करने के लिए कई तरह की दवाइयाँ मौजूद हैं लेकिन आप शायद ये बात नहीं जानते होंगे कि आप घर में ही कुछ आयुर्वेदिक नुस्खों को अपनाकर बढ़े हुए यूरिक एसिड को कम कर सकते हैं। जी हां, आयुर्वेदिक उपायों को अपनाकर भी आप आसानी से बढ़े हुए यूरिक एसिड को कम करके जोड़ो के दर्द से छुटकारा पा सकते हैं। आइए जानते हैं कैसे?

यूरिक एसिड की समस्या कब होती है?

हेल्थ एक्सपर्ट के मुताबिक, यूरिक एसिड के बढ़ने से शरीर के जोड़ों में तेज दर्द होने लगता है. पहले सिर्फ बुजुर्गों में ही ऐसी समस्या देखने को मिलती थी लेकिन अब कम उम्र के लोग भी इसका शिकार होने लगे हैं। जब भी हम प्यूरिन युक्त फूड्स अधिक मात्रा में खाते हैं, तब खून में Uric acid की मात्रा बढ़ जाती है। हालांकि हमारी किडनी यूरिक एसिड को फिल्टर कर उसे यूरिन के माध्यम से शरीर के बाहर निकाल देती है लेकिन जब प्यूरिन की मात्रा बढ़ जाती है तो किडनी ठीक से काम नहीं कर पाती है और यूरिक एसिड ब्लड में मिलने लगता है।

यूरिक एसिड क्या होता है?

यूरिक एसिड खून में पाया जाने वाला एक रसायन होता है। यूरिक एसिड का निर्माण प्यूरीनयुक्त खाद्य पदार्थों की पाचन प्रक्रिया के दौरान होता है। हमारा शरीर किडनी की मदद से यूरिक एसिड को फ़िल्टर करता है। फिर वह पेशाब के साथ शरीर से बाहर निकल देता है। दरअसल, जब शरीर में प्यूरीन का लेवल काफी ज्यादा बढ़ जाता है तो किडनी उसे ठीक से फ़िल्टर नहीं कर पाती है। ऐसे में शरीर में यूरिक एसिड की मात्रा बढ़ जाती है और शरीर के कई हिस्सों में दर्द की शिकायत होने लगती है।

यूरिक एसिड बढ़ने से क्या खतरा हो सकता है? 

शरीर में यूरिक एसिड बढ़ना यानी बीमारियों का प्रवेश होना। यूरिक एसिड के बढ़ते ही जोड़ों में दर्द, सूजन, गाउट और गठिया जैसी बीमारी उतपन्न हो जाती हैं। साथ ही यूरिक एसिड किडनी के काम को भी प्रभावित कर देता है। यदि कोई व्यक्ति डायबिटीज या हार्ट का मरीज है, तो उसे और भी कई समस्याएँ हो सकती हैं। दरअसल, कई बार किडनी यूरिक एसिड को बाहर नहीं निकाल पाती है, ऐसे में यूरिक एसिड क्रिस्टल का रूप ले लेता है और फिर वह शरीर में जोड़ो के आसपास जमा होने लगता है। इससे शरीर में जोड़ो का दर्द उत्पन्न हो जाता है।

यूरिक एसिड बढ़ने के लक्षण क्या हैं?

  • जोड़ों में दर्द 
  • उंगलियों में सूजन-दर्द 
  • जोड़ों में गांठ की शिकायत
  • उठने-बैठने में परेशानी 
  • गुर्दे की पथरी 
  • थकान, बुखार और ठंड 

यूरिक एसिड को कम करने के लिए किन बातों का ध्यान रखना चाहिए?

  • यूरिक एसिड बढ़ाने वाली दवाएं ना खाएं। 
  • कॉफी और चाय का सेवन कम करें। 
  • वजन कम करें। 
  • फाइबर रिच फूड और विटामिन सी डाइट में शामिल करें। 
  • प्यूरिन रिच फूड्स का सेवन करने से बचें।
  • नशीले पदार्थों से दूरी बनाकर रखें। 
  • एयरेटेड ड्रिंक्स में हाई शुगर होता है, जितना हो सके इनसे बचें.
  • ज्यादा फ्रक्टोज वाले फलों का सेवन ना करें। 
  • पालक, ब्रोकली, हरी मटर, आदि जैसी प्यूरीन वाली सब्जियां खाने से बचें। 
  • पानी ज्यादा मात्रा में पिएं।
  • मीट का सेवन ना करें। 
  • रोजाना एक्सरसाइज या व्यायाम करें।  
  • रात में जल्दी भोजन करने की कोशिश करें।

यूरिक एसिड को कम करने का आयुर्वेदिक इलाज क्या है?

आयुर्वेद के मुताबिक, शरीर में जब यूरिक एसिड बढ़ जाता है तो इससे पथरी और गठिया रोग होता है। हम आपको आज कुछ ऐसे आयुर्वेदिक नुस्खें बता रहे हैं जो  यूरिक एसिड के लक्षणों को दूर करने में बेहद असरदार साबित होते हैं। आइए जानते हैं इन आयुर्वेदिक नुस्खों के बारे में।

गिलोय 

गिलोय को सबसे शक्तिशाली आयुर्वेदिक जड़ी बूटी माना जाता है। गिलोय इम्यून सिस्टम को मजबूत करने के साथ-साथ Uric acid को कम करने के लिए भी काफी असरदार साबित हुई है। इससे शरीर में पित्त की मात्रा कम होती है और वात दोष भी कम होता है।

सौंठ और हल्दी

सौंठ और हल्दी का पाउडर शरीर में Uric acid को कम करने में मदद करता है। साथ ही इसके सेवन से जोड़ो के दर्द में भी काफी आराम मिलता है। आप चाहे तो सौंठ और हल्दी के पाउडर में पानी मिलाकर उसे दर्द वाली जगह पर भी लगा सकते हैं।

काली किशमिश

काली किशमिश के सेवन से हडिडयां मजबूत होती हैं। Uric acid से होने वाले दर्द से राहत पाने के लिए आप रोजाना रात में काली किशमिश को भिगोकर रख दें और सुबह इसका सेवन करें. इससे आपको काफी आराम मिलेगा।

नीम 

औषधीय गुणों से भरपूर नीम को कई बीमारियों के इलाज के लिए इस्तेमाल किया जाता है। Uric acid के मरीजों के लिए भी ये काफी फायदेमंद है। आप नीम के पेस्ट को दर्द वाली जगह पर लगा लें, इससे दर्द और सूजन दोनों से ही राहत मिलेगी।

त्रिफला

भीभीतकी, हरीतकी और आंवला से मिलकर बनने वाला त्रिफला भी Uric acid के मरीजों के लिए काफी मददगार साबित हो सकता है। सुबह रोजाना खाली पेट त्रिफला पाउडर को एक ग्लास गर्म पानी में मिलाकर पीने से काफी आराम मिलेगा।

गोखरू 

गोखरू का फल शरीर के लिए काफी फायदेमंद होता है। आप ताजे का सालभर पुराने गोखरू के फल को अच्छे से कुचलकर इसे पानी में भिगो दें और फिर इसे एक-दो दिन तक पी लें। हालांकि, तीन दिन से ज्यादा इस पानी का इस्तेमाल न करें।

वरूण चूर्ण

वरूण चूर्ण भी आयुर्वेद में सबसे शक्तिशाली और एंटी-इंफ्लेमेटरी गुणों से भरपूर दवाई मानी जाती है। वरूण चूर्ण का सेवन करने से जोड़ो के दर्द और सूजन दोनों से राहत मिलती है। साथ ही ये ब्लड में Uric acid को बढ़ने से भी रोकता है।

मुस्ता 

मुस्ता भी Uric acid को कण्ट्रोल करने के लिए सबसे असरदार आयुर्वेदिक जड़ी बूटी मानी जाती है। आप मुस्ता को हल्का दरदरा पीस लें और फिर इसे रातभर पानी में भिगोकर रख दें। सुबह उठकर आप इस पानी को अच्छे से उबालकर पी लें।

नींबू पानी 

नींबू में अधिक मात्रा में विटामिन-C पाया जाता है जो शरीर में एसिडिक प्रभाव पैदा करता है। इससे Uric acid का स्तर कम होने लगता है। रोजाना सुबह उठकर गुनगुने पानी में नींबू निचोड़कर उसका सेवन करने से आपको काफी फायदा पहुंचेगा।

कमर के निचले हिस्से में होने वाला दर्द ले सकता है गंभीर रूप, अपनाएँ ये घरेलू आयुर्वेदिक नुस्खें

उम्र बढ़ने के साथ-साथ शरीर में कई तरह की परेशानियां होने लगती है। अब ना सिर्फ बुढ़ापे में बल्कि जवानी में भी लोगों को स्वास्थ्य संबंधी समस्याएँ हो रही है। इसका सबसे बड़ा कारण है बदलती लाइफस्टाइल और शारीरिक हरकत में कम। दरअसल, दिन का ज्यादातर समय ऑफिस में घंटों कुर्सी पर बैठे-बैठे निकल जाता है। इसके अलावा हेल्दी खाने की जगह जंक फ़ूड का सेवन बढ़ गया है। साथ ही एक्सरसाइज या व्यायाम की कमी शरीर में कई तरह की बीमारियां बढ़ा देती है। सबसे ज्यादा अगर लोग किसी दिक्कत से परेशान रहते हैं तो वो है कमर दर्द।

पीठ दर्द, कमर दर्द, या बैक पैन आम शारीरिक बीमारियों में से एक है। ये बीमारी हर दूसरे व्यक्ति को अपने चपेट में ले लेती है। बदलती लाइफस्टाइल और खासकर ऑफिस में लंबे समय तक एक ही जगह गलत पॉश्चर में बैठने के कारण कमर के निचले हिस्से में दर्द होना शुरू हो जाता है। दरअसल, इससे रीढ़ को सहारा देने वाली मांसपेशियों पर दबाव पड़ता है और फिर उनमें अकड़न आ जाती है। इससे पहले तो कमर दर्द होना शुरू हो जाता है। फिर ये दर्द धीरे-धीरे कमर के निचले हिस्से तक पहुँच जाता है। कुछ समय तक तो लोग इसे आम समझकर नजरअंदाज करते हैं, लेकिन अगर कमर के निचले हिस्से में दर्द लंबे समय तक बना रहे तो इसे इग्नोर नहीं करना चाहिए। आमतौर पर कमरदर्द या कमर के निचले हिस्से में होने वाले दर्द से छुटकारा पाने के लिए आप आयुर्वेदिक इलाज की मदद ले सकते हैं। आप साधारण घरेलू आयुर्वेदिक नुस्खे अपनाकर कमर के निचले हिस्से में होने वाले दर्द को दूर कर सकते हैं। हम आपको इस आर्टिकल में कमर के निचले हिस्से में दर्द होना कारण, इसके लक्षण और इससे राहत पाने के आयुर्वेदिक उपायों के बारे में बताएंगे।

कमर के निचले हिस्से में दर्द होने के क्या कारण हैं?

कमर के निचले हिस्से में दर्द होने के कई कारण हैं जिनके बारे में हम आपको बता रहे हैं-

ख़राब पॉश्चर

दरअसल, जब भी आप लंबे समय तक गलत तरीके से बैठते हैं तो इससे मांसपेशियों में खिंचाव होने लगता है। इसके अलावा गलत तरीके या गलत पॉश्चर में घूमने से भी पीठ के निचले हिस्से में दर्द महसूस होने लगता है। इसके अलावा लंबे समय तक एक ही जैसी पोजीशन में बैठने से भी कमर के निचले हिस्से में दर्द होना शुरू हो जाता है।

मांसपेशियों में मोच आना

कमर के निचले हिस्से में दर्द होने का एक और कारण मांसपेशियों में मोच आना भी हो सकता है। दरअसल, कई बार गलत तरीके से बैठने और उठने से या फिर गलत तरीके से एक्‍सरसाइज करने से मांसपेशियों में खिंचाव हो जाता है। इससे बाद में दर्द होने लगता है।

किडनी में पथरी होना

कई बार लोअर बैक पैन किडनी में पथरी होने कारण भी होने लगता है। इससे असहनीय दर्द होता है। ये दर्द पीठ के निचले हिस्से तक फ़ैल जाता है। जब आपको मूत्र में रक्त, बार-बार पेशाब आना और मतली जैसे लक्षणों के साथ पीठ के निचले हिस्से में भी दर्द होने लगे तो आप तुरंत डॉक्टर को दिखाएं।

अकड़न

इन दिनों महिलाओं में अकड़न की समस्या आम हो गई है। अकड़न के कारण पीठ निचले हिस्से की मांसपेशियां ज्यादा सिकुड़ जाती है या फिर अकड़ जाती है। ऐसे में कमर अंदर घुस जाती है और हिप्स ऊपर की तरफ निकल जाते हैं। इससे शरीर का शेप भी भद्दा लगता है और हमेश लोअर बैक पैन होने लगता है।

कमजोर कोर मांसपेशियां

जब रीढ़ की हड्डी को सुरक्षित ना किया जाए तो तो कमर में दर्द होना शुरू हो जाता है। कोर मसल्स रीढ़ की हड्डी से दोनों तरफ से जुड़ी होती हैं। अगर कोर कमजोर होती है तो रीढ़ की हड्डी में दर्द होने लगता है। ये दर्द निचले हिस्से तक फ़ैल जाता है।

कमर के निचले हिस्से में दर्द होने के लक्षण क्या है?

  • पीठ पर खिंचाव
  • अचानक दर्द होना
  • सुन्न होना
  • चेहरे की चमक खो जाना
  • रीढ़ की हड्डी का दबाव
  • वजन बढ़ना
  • तनाव
  • दर्द का पैरों की तरफ बढ़ना

कमर के निचले हिस्से में दर्द से बचाव के आयुर्वेदिक उपाय क्या हैं?

यदि आप भी हल्के या गंभीर लोअर बैक पैन यानी कमर के निचले हिस्से में दर्द से परेशान हैं तो हम आपको आज कुछ ऐसे सरल आयुर्वेदिक उपाय बता रहे हैं, जिन्हें आप घर में अपनाकर इस दर्द से राहत पा सकते हैं।

अदरक

कमर के निचले हिस्से में दर्द से आपको अदरक राहत दिला सकती है। आप ताज़ी अदरक के चार-पांच टुकड़े लें और उसमें डेढ़ कप पानी डालकर करीब 15 मिनट तक उबालें। जब वह ठंडा हो जाए तो आप उस पानी में जरा-सा शहद मिलाकर पी लें। आप अदरक का पेस्ट बनाकर दर्द वाली जगह पर भी लगा सकते हैं। इससे आपको राहत मिलेगी।

सरसो का तेल

सरसो का तेल हर तरह के दर्द से राहत दिलाने में मदद करता है। आप सरसो के तेल को हल्का गर्म करके उसे दर्द वाले हिस्से पर लगाकर हल्के हाथ से मालिश करें। आप चाहे तो सरसो के तेल में 10-12 लहसुन की कलियां और एक चम्मच अजवाइन डालकर उसे अच्छे से उबाल लें। फिर आप इसे ठंडा करके मालिश कर लें।

खसखस के बीज

कमर दर्द और कमर के निचले हिस्से में दर्द से राहत दिलाने में खसखस के बीज काफी असरदार है। आप आधा कप खसखस के बीज और उसमें थोड़ी सी मिश्री डालकर पीस लें। फिर इसे रोजाना सुबह और शाम को दूध में एक चम्मच डालकर पी लें।

तुलसी

कई चमत्कारी गुणों से भरपूर तुलसी कमर और उसके निचले हिस्से में होने वाले दर्द को ठीक करने में राहत दिलाएगी। आप एक कप पानी में तुलसी की 10 पत्तियां डालकर उबाल लें। फिर आप उसे ठंडा करने के बढ़ उसमें एक चुटकी नमक डालकर पी लें।

गेहूं

रोजाना खाने में इस्तेमाल होने वाले गेंहूं भी आपके लोअर बैक पैन से राहत दिलाने में मदद करेंगे। दरअसल, गेहूं में कई इसे दर्द निवारक गुण मौजूद होते हैं जो कमर के निचले हिस्से में होने वाले दर्द से छुटकारा दिला सकते हैं। आप रोजाना एक ग्लास पानी में एक मुट्ठी गेहूं डालकर रख दें और अगले दिन गेहूं को एक ग्लास दूध में डालकर गर्म कर लें। आप इसका दिन में दो बार सेवन करें, इससे आपको कमर दर्द से राहत मिल सकती है।

लहसुन

लहसुन वैसे तो शरीर के हर हिस्से के लिए बहुत फायदेमंद है। लेकिन आप इसका इस्तेमाल कमर के निचले हिस्से में होने वाले दर्द को कम करने के लिए भी कर सकते हैं। आप सरसो के तेल में लहसुन की कुछ कलियों को डाल दें और उसे अच्छे से उबाल लें। फिर तेल ठंडा होने पर आप उस तेल से दर्द वाली जगह पर मसाज करें। इससे आपके दर्द में काफी राहत मिलेगी।

क्या आपका कोलेस्ट्रॉल बढ़ा हुआ हैं? हार्ट ब्लॉकेज से बचने के लिए अपनाएं ये आयुर्वेदिक नुस्खे

इन दिनों तो ना सिर्फ बुजुर्ग लोग बल्कि नौजवान भी कई तरह की बीमारियों की चपेट में आ रहे हैं। पिछले करीब एक दशक की बात करें तो इस दौरान सबसे ज्यादा हृदय रोगों के मामले काफी तेजी से बढ़े हैं। इतना ही नहीं, विश्व स्वास्थ्य संगठन यानी WHO की एक रिपोर्ट के मुताबिक तो दुनियाभर में हृदय रोग मौत का सबसे प्रमुख कारण है। आप शायद ही ये बात जानते होंगे कि हृदय रोगों के बढ़ने का सबसे मुख्य कारण कोलेस्ट्रॉल का स्तर बढ़ना है। व्यक्ति को स्वस्थ रखने और बीमार रखने दोनों में ही कोलेस्ट्रॉल अहम् किरदार निभाता है।

जब आपके शरीर में कोलेस्ट्रॉल की मात्रा बढ़ने लगती है तो आप हाई कोलेस्ट्रॉल की समस्या का शिकार हो जाते हैं। ऐसे में शरीर में कई तरह की दिक्कतों का सामने करना पड़ता है। आमतौर पर लोग कोलेस्ट्रॉल कम करने के लिए दवाइयों का सेवन करते हैं, लेकिन क्या आप ये बात जानते हैं कि आप आयुर्वेदिक नुस्खों को अपनाकर भी हाई कोलेस्ट्रॉल को कम कर सकते हैं। आज हम आपको इस आर्टिकल के माध्यम से कोलेस्ट्रॉल क्या है, कोलेस्ट्रॉल कितने प्रकार का होता है, हाई कोलेस्ट्रॉल कैसे होता है, हाई कोलेस्ट्रॉल के लक्षण, हाई कोलेस्ट्रॉल से बचाव के आयुर्वेदिक उपाय आदि के बारे में बता रहे हैं।

कोलेस्ट्रॉल क्या होता है?

कोलेस्ट्रॉल एक मोम जैसा पदार्थ होता है। यह हमारे शरीर में खून के अंदर पाया जाता है। कोलेस्ट्रॉल हमारे शरीर में मुख्य भूमिका निभाता है। मानव शरीर को कोलेस्ट्रॉल की जरूरत कोशिकाओं को स्वस्थ रखने और नई कोशिकाओं के निर्माण के लिए भी होती है. कोलेस्ट्रॉल लीवर में बनता है जो शरीर के हर हिस्से में पाया जाता है। यह बॉडी में हॉर्मोन्स को कंट्रोल करने के अलावा सूरज की रोशनी को विटामिन D में बदलने में मदद करता है। इतना ही नहीं, कोलेस्ट्रॉल शरीर से टॉक्सिन्स को सोखकर स्वस्थ रखता है। ये दिमाग के लिए भी फायदेमंद होता है।

कोलेस्ट्रॉल कितने प्रकार का होता है?

कोलेस्‍ट्रॉल दो प्रकार के होते हैं। पहला ही हाई डेंसिटी लिपोप्रोटीन (HDL cholesterol) जिसे गुड कोलेस्‍ट्रॉल भी कहा जाता है और दूसरा है लो डेंसिटी लिपोप्रोटीन (LDL cholesterol) जिसे बैड कोलेस्‍ट्रॉल कहा जाता है। एचडीएल कोलेस्‍ट्रॉल को सेहत के लिए काफी अच्छा माना जाता है। ये खून से अतिरिक्त फैट हटाने में मदद करता है, इसलिए इसे गुड कोलेस्‍ट्रॉल कहते हैं। ये हार्ट के लिए भी फायदेमंद होता है। वहीं एलडीएल कोलेस्‍ट्रॉल हार्ट के लिए नुकसानदायक होता है। दरअसल, शरीर में बैड कोलेस्‍ट्रॉल बढ़ने से हार्ट ठीक से काम नहीं कर पाता. इस कारण तमाम तरह की परेशानियां होती हैं. एलडीएल को खराब कोलेस्‍ट्रॉल के नाम से भी जाना जाता है. ऐसे में तमाम तरह की परेशानियां होने लगती है।

कोलेस्ट्रॉल बढ़ने के क्या कारण हैं?

इन दिनों ज्यादातर लोगों के बीच कोलेस्ट्रॉल बढ़ने यानी हाई कोलेस्ट्रॉल की समस्या हो रही हैं। हाई कोलेस्ट्रॉल होने से हार्ट डिसीज और स्ट्रोक का भी खतरा बढ़ गया है। कोलेस्ट्रॉल बढ़ने के कई अलग-अलग कारण हो सकते हैं, जिनके बारे में हम आपको विस्तार से बता रहे हैं।

अस्वस्थ आहार

यदि आप लगातार फैट वाले आहार का सेवन कर रहे हैं, जिसमें सैच्युरेटेड फैट की मात्रा अधिक रहती है तो ऐसे में खून में एलडीएल या बैड कोलेस्ट्रॉल बढ़ने लगता है। मीट, डेयरी उत्पाद, अंडा, नारियल तेल, पाम ऑइल, मक्खन, चॉकलेट्स, तली-भुनी चीजें, प्रोसेस्ड फूड और बेकरी आइटम से ज्यादातर दूरी बनाकर रखें।

ख़राब लाइफस्टाइल

यदि आप दिनभर में ज्यादातर समय बैठे रहते हैं और शारीरिक गतिविधि का ज्यादा काम नहीं करते हैं तो इससे भी रक्त वाहिकाओं में एलडीएल कोलेस्ट्रॉल का स्तर बढ़ जाता है। इसके अलावा मोटापे की समस्या भी खून में फैट के सर्कुलेशन को बाधित करती है.

धूम्रपान और शराब

बहुत ज्यादा धूम्रपान करने या शराब के सेवन से शरीर में रक्त धमनियां कठोर हो जाती है। इससे ब्लड प्रेशर बढ़ने लागत है और हृदय को ऑक्सीजन की जरूरत पड़ती है। साथ ही ये कोलेस्ट्रॉल स्तर को बढ़ाता है और एचडीएल स्तर को कम करता है।

वंशानुगत

कई बार जब आपके परिवार में कोई व्यक्ति यदि हाई कोलेस्ट्रॉल जैसी बीमारी का शिकार हो तो आपको भी ये बीमारी होने का ख़तरा बढ़ जाता है।

अन्य बीमारी

पीसीओएस, हाइपोथायरायडिज्म, डायबिटीज, किडनी डिजीज, एचआईवी और ऑटोइम्यून बीमारियां जैसे – रुमेटायड आर्थराइटिस, सोरायसिस के कारण भी शरीर में कोलेस्ट्रॉल का लेवल बढ़ने लगता है।

शरीर में बढ़ते कोलेस्ट्रॉल लेवल के क्या लक्षण हैं?

  • हाई बीपी
  • सीने में दर्द
  • सांस फूलना
  • थकान औऱ कमजोरी
  • स्किन पर पीले रंग का जमाव
  • झनझनाहट महसूस होना
  • जी मिचलाना
  • सुन्न होना
  • अत्यधिक थकान
  • नाखूनों का पीलापन
  • नाखूनों में दरार आना
  • हाथों में दरार दिखना
  • हाथों में झनझनाहट होना
  • पसीना आना
  • मोटापा

स्वस्थ व्यक्ति के लिए कोलेस्ट्रॉल की सही मात्रा क्या है?

कुल कोलेस्ट्रॉल: 200- 239 mg/dL से कम
HDL: 60 mg/dL से अधिक
LDL: 100 mg/dL से कम

हाई कोलेस्‍ट्रॉल होने से कैसे बचें?

  • शराब और धूम्रपान से दूरी बनाएं।
  • सप्ताह में कम से कम 150 मिनट व्यायाम करें।
  • ज्यादा शुगर, सेचुरेटेड फैट और रिफाइंड खाद्य पदार्थ खाने से बचें।
  • अपने भोजन में दाल, बीन्स, नट्स, टोफू शामिल करें।

हाई कोलेस्‍ट्रॉल को कम करने के आयुर्वेदिक उपाय क्या हैं?

लहसुन

रोजाना सुबह-शाम लहसुन का सेवन करने से शरीर में कोलेस्‍ट्रॉल की मात्रा कम हो सकती है।

नींबू

नींबू शरीर के वजन को कम करने के साथ-साथ कोलेस्‍ट्रॉल को भी कम करने में मदद करता है। रोजाना खाली पेट नींबू का सेवन करने से कोलेस्‍ट्रॉल तेजी से कम होता है।

अलसी

कोलेस्ट्रॉल को कम करने में अलसी बेहद फायदेमंद है, इसके लिए आप अलसी के पिसे हुए बीजों का इस्तेमाल कर सकते हैं।

ओट्स

फाइबर से भरपूर ओट्स का सेवन करने से कोलेस्ट्रॉल कम होने लगता है। आप रोजाना नाश्ते में ओट्स को शामिल कर सकते हैं।

मछली का तेल

कोलेस्ट्रॉल को कम करने में मछली का भी अहम रोल होता है। दरअसल, मछली के तेल में ओमेगा 3 और फैटी एसिड मौजूद होता है जो कोलेस्ट्रॉल कम करने में मदद करता है।

हल्दी और करी पत्ता

हल्दी और करी पत्ते में भी कोलेस्ट्रॉल को कम करने के कई उपयोगी गुण पाए जाते हैं। आप रोजाना भोजन बनाते समय इन दो चीजों का उपयोग जरूर करें।

अर्जुन की छाल

कोलेस्ट्रॉल को कम करने के लिए आप अर्जुन के पेड़ की छाल का भी सेवन कर सकते हैं। आप रोजाना एक ग्लास पानी में इसे भिगोकर और फिर उबालकर पी लें। इससे आपका कोलेस्ट्रॉल लेवल घटने लगता है।

विटामिन-सी

कोलेस्ट्रॉल लेवल को घटाने के लिए आपको रोजाना अपने आहार में विटामिन-सी (Vitamin-C) युक्त चीजें शामिल करनी होंगी। आप आँवला, अनार, नींबू, संतरा, मौसंबी आदि जैसी खट्टी चीजों को अपने आहार में शामिल करें।

अंकुरित दाल

दाल हमारे शरीर के लिए सबसे ज्यादा फायदेमंद होती हैं। आप रोजाना अपने आहार में राजमा, चने, मूंग, सोयाबीन और उड़द आदि जैसी अंकुरित दालों को शामिल करे। ये आपके कोलेस्ट्रॉल लेवल को घटाने में काफी मददकर साबित होंगी।

हर जगह फ़ैल रहा Eye Flu का कहर, आयुर्वेदिक इलाज से दूर करें ये बीमारी

बरसात के मौसम अपने साथ-साथ तमाम बीमारियों को भी लेकर आते हैं। मानसून में आने वाली ज्यादातर बीमारियां संक्रमित होती हैं। ये एक से दूसरे में बड़ी तेजी से फैलती है। इन दिनों आंखों की एक बीमारी ने हर जगह हाहाकार मचा रखा है। इस बीमारी का नाम है कंजंक्टिवाइटिस, जिसे पिंक आई इन्फेक्शन या आई फ्लू भी कहा जाता है। दिल्ली समेत देश के कई हिस्सों में आई फ्लू का संक्रमण बहुत तेजी से बढ़ता जा रहे हैं। बच्चों से लेकर बड़ों तक हर कोई इस बीमारी का शिकार हो रहा है।

आँखों में होने वाले इस इन्फेक्शन के कारण सब चीजें प्रभावित होती है। आप शायद ये बात नहीं जानते होंगे कि कंजंक्टिवाइटिस यानी आई फ्लू का आयुर्वेदिक इलाज भी संभव है। आप घर में करने वाले कुछ आयुर्वेदिक नुस्खों को आज़माकर भी आईफ्लू जैसी संक्रमित बीमारी से छुटकारा पा सकते हैं। लेकिन इससे पहले हम जानेंगे कि आखिर आई फ्लू है क्या, आई फ्लू कैसे फैलता है, आई फ्लू क्यों होता है, आई फ्लू के लक्षण और आई फ्लू से बचाव कैसे करें?

कंजंक्टिवाइटिस/आई फ्लू क्या है?

आंखों के होने वाले इन्फेक्शन को आई फ्लू या कंजंक्टिवाइटिस कहते हैं। इसमें व्यक्ति की आँख इन्फेक्शन के कारण लाल हो जाती है। आँखों से लगातार पाने भी निकलता है और इन्फेक्शन के कारण वह सूज भी जाती है। आखों में दिनभर गंदगी जमा होती है, जिससे साफ़ नहीं दिख पाता है।

आई फ्लू क्यों होता है?

अचानक आई बाढ़ और बारिश के कारण इस बीमारी का खतरा बढ़ गया है। दरअसल मानसून में टेम्प्रेचर कम हो जाता है और हाई ह्यूमिडिटी बढ़ जाती है। इस वजह से लोग बैक्टीरिया, वायरस और एलर्जी के संपर्क में आते हैं। ये सारे इन्फेक्शन और एलर्जिक रिएक्शन्स आई फ्लू यानी कंजंक्टिवाइटिस का कारण बनते हैं।

आई फ्लू के क्या लक्षण हैं?

  • आंखें लाल होना
  • आंखों में चुभन
  • आंखों में खुजली
  • आंखें चिपकना
  • आंखों में सूजन है
  • लाइट सेंसिटिविटी

कैसे होता है आई फ्लू?

बरसात के मौसम में उमस बढ़ जाती है। ऐसे में बार-बार पसीना आता और लोग पसीना पोंछने के चक्कर में अपनी आँखों को छूटे हैं। इस वजह से आँखों में गंदे हाथ लग जाते हैं और इन्फेक्शन फ़ैल जाता है। आई फ्लू के वायरस सबसे ज्यादा सतहों पर मौजूद रहते हैं जैसे दरवाजे के हैंडल, टॉवल या टिश्यू आदि। इसलिए इन्हें हाथ लगाने के बाद तुरंत अपने हाथ धोएं।

क्या संक्रमित व्यक्ति को देखने से भी हो सकता है आई फ्लू?

विशेषज्ञों के मुताबिक, ये एक व्यक्ति से दूसरे व्यक्ति में फैलता है। यदि आप आई फ्लू से संक्रमित किसी व्यक्ति के बहुत पास जाते हैं तो आपको इन्फेक्शन हो सकता है। इसके अलावा व्यक्तिगत चीजों को शेयर करने से भी इसका खतरा बना रहता है। लेकिन ये ग़लतफ़हमी है कि किसी संक्रमित व्यक्ति की आँखों में देखने से इन्फेक्शन हो सकता है। जब तक आप उस व्यक्ति की आँखों से निकलने वाले पानी के संपर्क में नहीं आते, तब तक आपको आई फ्लू होने का जोखिम नहीं होगा।

आई फ्लू होने पर क्या करें?

  • जिसे इन्फेक्शन हुआ है, वह खुद को आइसोलेट कर लें।
  • वह अपने टॉवल, तकिए से लेकर हर चीज को अलग रखें।
  • इन्फेक्शन होने पर 3 से 5 दिन तक घर में ही रहें।
  • जितना हो सके काला चश्मा लगाकर रखें।
  • किसी भी सतह को छूने के बाद तुरंत साबुन से हाथ धोएं।
  • दूसरे लोगों से दूरी बनाकर रखें।
  • धूप या भीड़भाड़ वाली जगह पर जाने से बचें।
  • अपनी आँखों को छूकर वह हाथ कहीं और ना लगाएं।
  • आँखों को पानी से अच्छी तरह से धोएं।
  • आंख को साफ करने के लिए फिल्टर या उबले हुए पानी और रुई का इस्तेमाल करें।
  • हर चीज में साफ़-सफाई का खास ध्यान रखें।

आई फ्लू होने का रिस्क किन लोगों को ज्यादा है?

आई फ्लू बीमारी किसी भी वर्ग के व्यक्ति को हो सकती है। बच्चों, एलर्जिक पेशेंट, बुजुर्ग और कमजोर इम्यूनिटी वाले लोगों को ये इन्फेक्शन होने की ज्यादा रिस्क रहती है।

आई फ्लू कितने दिन में ठीक होता है?

वैसे तो आई फ्लू का इन्फेक्शन पूरी तरह से खत्म होने में 5-6 दिन लग जाते हैं। लेकिन यदि ये बहुत ज्यादा बढ़ गया है, या एक आँख से दूसरी आँख में फ़ैल गया है, तो इसे ठीक होने में 10-15 दिन या फिर एक महीना भी लग सकता है।

आई फ्लू का आयुर्वेदिक इलाज क्या है?

हल्दी

एंटीबैक्टीरियल और एंटीऑक्सीडेंट गुणों से भरपूर हल्दी को आप गुनगुने पानी में एक चुटकी डाल दें और फिर इस पानी को रुई में भिगोकर उससे अपनी ऑंखें साफ़ करें। इससे इन्फेक्शन कम हो जाएगा।

गुलाब जल

गुलाब जल आँखों के लिए काफी फायदेमंद है। इससे आँख धोने से आई फ्लू के बढ़ने का खतरा कम हो सकता है।

आलू या केले ले छिलके

आप रात में सोने से पहले आलू के छिलके निकालकर उसे पतले टुकड़ो में काट लें और आँखों पर 10-15 मिनट के लिए रख दें। इससे आँखों में जलन नहीं होगी। आप केले के छिलके भी रख सकते हैं।

ग्रीन टी बैग

आई फ्लू में आँखों को ठंडक और आराम देने के लिए आप टी बैग इस्तेमाल कर सकते हैं। इसे आँखों पर लगाने से सूजन भी कम हो जाएगी।

ठंडे पानी से सिकाई

आई फ्लू होने पर आप ठंडे पानी से इसकी सिकाई करें। इससे इन्फेक्शन धीरे-धीरे खत्म होने लगेगा और आँखों को भी आराम पहुँचने में मदद मिलेगी।

आंवला जूस

रोजाना सुबह खाली पेट और रात को सोने से पहले आंवले के जूस को पानी में मिलाकर पी लें। इससे इन्फेक्शन जड़ से खत्म होने में मदद मिलेगी।

त्रिफला चूर्ण

त्रिफला आँखों के लिए काफी फायदेमंद होता है। आप त्रिफला के चूर्ण को रातभर पानी में भिगोकर रख दें और सुबह उसे अच्छी तरह छानकर छने हुए पानी से आँखों को धो लें। इससे आँखों की रोशनी भी बढ़ेगी और आँखों में होने वाली बीमारियां भी खत्म हो जाएगी।

तुलसी

औषधीय गुणों से भरपूर तुलसी आँखों में होने वाले इन्फेक्शन को दूर करने में मदद करती है। आप तुलसी के पत्ते रातभर भिगोकर रख दें और सुबह उस पानी से आँखों को अच्छे से धो लें। इससे आपको काफी फायदा पहुंचेगा।

शहद

शहद भी आँखों के लिए काफी फायदेमंद होता है। हर आयुर्वेदिक इलाज में शहद बेहद महत्वपूर्ण होता है। इससे आँखों के इन्फेक्शन को भी दूर किया जा सकता है। आप एक ग्लास पानी में दो चम्मच शहद मिला लें। फिर आप इस पानी से आँखों को अच्छी तरह से धो लें। इससे इन्फेक्शन दूर हो जाएगा।

क्या आप मधुमेह (Diabetes) पर काबू पाना चाहते हो? तुरंत अपनाएं ये रामबाण आयुर्वेदिक नुस्खे

आज के समय में जो सबसे आम बीमारी हो गई है वो है डायबिटीज जिसे हम शुगर और मधुमेह भी कहते हैं। इस बीमारी ने हर दूसरे व्यक्ति को जकड़ रखा है। वैसे तो आज भी कई लोग डायबिटीज को आम बीमारी ही मानते हैं और इसके इलाज में भी लापरवाही करते हैं। लेकिन डायबिटीज इतनी खतरनाक बीमारी है कि जब ये बढ़ जाती है, तो ये कोई बड़ी बीमारी के रूप में बदल सकती है। इसलिए तो Diabetes को ‘साइलेंट किलर‘ भी कहा जाता है। डायबिटीज का कोई स्थाई इलाज नहीं है। एक बार जो इसकी चपेट में आ गया, उसे फिर उम्रभर इससे लड़ना पड़ता है। आमतौर पर डायबिटीज को कंट्रोल करने के लिए लोग एलोपेथी दवाइयों का ही सेवन करते हैं, लेकिन शायद आप ये बात नहीं जानते होंगे कि डायबिटीज का आयुर्वेद इलाज भी संभव है।

आयुर्वेदिक इलाज में किसी भी प्रकार की सर्जरी नहीं की जाती है। इसमें बस कुछ आयुर्वेदिक जड़ी-बूटियों का सेवन करना होता है और इससे बीमारियों से काफी हद तक राहत मिल जाती है। पहले के समय में भी लोग डायबिटीज से पीड़ित रहते थे लेकिन वह आयुर्वेदिक जड़ी-बूटियों की मदद से इस बीमारी से खुद का बचाव कर लेते थे। आज हम आपको डायबिटीज बीमारी क्या है? डायबिटीज के लक्षण, डायबिटीज के कारण और डायबिटीज के आयुर्वेदिक इलाज के बारे में जानकारी दे रहे हैं।

डायबिटीज क्या है?

डायबिटीज के बारे में अन्य जानकारी जानने से पहले हम जानते हैं कि आखिर डायबिटीज है क्या? हमारे खून में ग्लूकोज की मात्रा बढ़ने के कारण Diabetes की समस्या होती है।

डायबिटीज होने का क्या कारण है?

आयुर्वेद के मुताबिक, मधुमेह यानी Diabetes का रोग शरीर में मेटाबॉलिज़म की समस्या के कारण होता है। दरअसल, मेटाबॉलिज़म एक ऐसी प्रक्रिया है, जिसके दौरान शरीर भोजन से जो भी पोषण तत्व प्राप्त करता है, उसका उपयोग करके वह एनर्जी बनाता है। यदि मेटाबॉलिज़म में कोई दिक्कत हो जाती है तो शरीर में जो इंसुलिन हॉर्मोन मौजूद होता है, वो ठीक से काम करना बंद कर देता है। ऐसे में शरीर में इंसुलिन की कमी होने लगती है और खून में शुगर लेवल बढ़ जाता है।

डायबिटीज होने के अन्य कारण क्या हैं?

  • सही डायट ना लेना
  • ख़राब लाइफस्टाइल
  • शरीर में अधिक कफ होना
  • प्रदूषित जगह पर रहना
  • शरीर हमेशा थका हुआ होना
  • गलत दवाओं का सेवन करना
  • जेनेटिक

डायबिटीज कितने प्रकार की होती है?

आमतौर पर Diabetes तीन प्रकार की होती है-

  1. टाइप 1 डायबिटीज
  2. टाइप 2 डायबिटीज
  3. जेस्टेशनल डायबिटीज

डायबिटीज के क्या लक्षण हैं?

  • ज्यादा भूख लगना
  • प्यास ज्यादा लगना
  • वजन कम होना
  • जल्दी-जल्दी पेशाब आना
  • धुंधला दिखाई देना
  • बहुत ज्यादा थकावट होना
  • छाले और घाव होना और उनका पक जाना

टाइप 1 Diabetes के क्या लक्षण हैं?

  • बहुत ज्यादा भूख लगना
  • बहुत ज्यादा प्यास लगना
  • बिना कोशिश के भी लगातार वजन कम होना
  • बार-बार पेशाब आना
  • धुंधला दिखना
  • थकावट
  • बार-बार मूड बदलना

टाइप 2 Diabetes के क्या लक्षण हैं?

  • भूख बढ़ जाना
  • प्यास बढ़ना
  • ज्यादा पेशाब आना
  • धुंधला दिखना
  • थकावट रहना
  • घाव धीरे-धीरे भरना
  • बार-बार संक्रमण होना

डायबिटीज का आयुर्वेदिक इलाज क्या है?

हल्दी और मेथी का पानी

सुबह के समय रोजाना एक ग्लास गर्म पानी में 1 चम्मच हल्दी पाउडर और 1 चम्मच मेथी पाउडर मिलाकर पीने से फास्टिंग शुगर को कंट्रोल करने में मदद मिलेगी।

आंवला चूर्ण

आंवले में मौजूद विटामिन सी और एंटीऑक्सीडेंट शरीर में मेटाबॉलिज्म को बढ़ाने में मदद करते हैं। इससे ब्लड शुगर लेवल कंट्रोल में रहता है। ये शरीर में इंसुलिन बनाने में कारगर साबित होता है।

सदाबहार का पौधा

सदाबहार बेहतरीन औषधीय गुणों वाला पौधा है। ये आपको हर जगह मिल जाएगा। डायबिटीज के मरीज सदाबहार की ताज़ी पत्तियों को चबाकर खा सकते हैं। या फिर आप सदाबहार के फूल को पानी में अच्छे से उबालकर सुबह खाली पेट पिएं।

अंजीर के पत्ते

अंजीर के साथ-साथ उसके पत्ते भी काफी फायदेमंद होते हैं। इसके पत्ते सुबह खाली पेट चबाने से या फिर पानी में उबालकर पीने से शुगर कंट्रोल में रहती है।

जामुन के बीजों का पाउडर

जामुन के बीज डायबिटीज के मरीजों के लिए काफी फायदेमंद होते हैं। रोजाना जामुन के बीज का पाउडर खाली पेट एक चम्मच गर्म पानी के साथ पी लें, शुगर कंट्रोल में रहेगी।

अंगूर के बीज

डायबिटीज को कंट्रोल में रखने के लिए अंगूर के बीज काफी फायदेमंद साबित होते हैं। आप इन्हें पीसकर इसका चूर्ण बना लें और रोजाना पानी से इसका सेवन करें।

गिलोय

गिलोय सबसे ज्यादा औषधीय गुणों से भरपूर पौधा है। इससे ब्लड में शुगर की मात्रा कंट्रोल में रहती है। एक कप पानी में एक चम्मच गिलोय पाउडर डालकर छोड़ दें और सुबह उठकर उसका सेवन करें।

नीम

नीम का इस्तेमाल ज्यादा आयुर्वेदिक दवाओं में होता है। इसमे एंटी-बैक्टीरियल और एंटी-फंगल गुण पाए जाते हैं। साथ ही नीम में कई ऐसे भी गुण पाए जाते हैं जो डायबिटिक को कंट्रोल करने में मदद करते हैं। आप नीम के पत्ते का या फिर इसके रस का सेवन कर सकते हैं।

सौंफ

रोजाना खाना खाने के बाद डायबिटीज के मरीज एक बड़ी चम्मच सौंफ का सेवन जरूर करें। इससे मीठा खाने की लालसा खत्म हो जाती है। साथ ही ये खाने को पचाने में मदद करती है।

जैतून का तेल

जैतून के तेल का सेवन करने से शरीर में कोलेस्ट्रॉल तो कंट्रोल होता ही है और साथ ही ये ब्लड शुगर लेवल को भी कंट्रोल करने में मदद करता है। आप खाने में भी इसका इस्तेमाल कर सकते हैं।

गुड़मार

गुड़मार एक आयुर्वेदिक जड़ी बूटी है। आमतौर पर इसका सेवन एलर्जी, खांसी और कब्ज जैसी बीमारियों को दूर करने के लिए होता है। लेकिन ये डायबिटीज के मरीजों के लिए काफी फायदेमंद होता है। रोजाना खाना खाने से एक घंटे पहले एक चम्मच गुड़मार के पत्तों का पाउडर खाने से शुगर कंट्रोल में रहती है।

Diabetes कंट्रोल करने के लिए आयुर्वेदिक चूर्ण बनाने की विधि

हम आपको आज कुछ ऐसी खास जड़ी बूटियों के बारे में बता रहे हैं, जिसके सेवन से आपकी शुगर हमेशा कंट्रोल में रहेगी। यदि ये सही तरीके से खाया जाए, तो आप इस बीमारी से छुटकारा भी पा सकते हैं। नीचे दी गई सभी जड़ी-बूटियों को सही मात्रा में मिलाकर इसका चूर्ण तैयार करें और रोजाना रात में सोते समय गर्म पानी से एक चम्मच यानी करीब 4 ग्राम इसका सेवन करें।

  • जामुन- 10 ग्राम
  • बिल्व – 10 ग्राम
  • चिरायता- 10 ग्राम
  • मधुनाशिनी- 20 ग्राम
  • त्रिकटु- 20 ग्राम
  • पिप्पली- 10 ग्राम
  • निर्गुंडी- 5 ग्राम
  • पुनर्नवा- 10 ग्राम
  • आंवला- 10 ग्राम
  • गुडुची- 20 ग्राम
  • भूमि-अमलकी- 15 ग्राम

 

आज के समय में यूं तो विभिन्न चिकित्सा पद्धतियों में डायबिटीज के कई इलाज मौजूद हैं लेकिन राजस्थान के भीलवाड़ा के रायला ग्राम स्थित ‘श्री नवग्रह आश्रमआयुर्वेदिक पद्धति से उपचार के लिए जाना जाता है। यहां पर कई प्रकार के रोगों का उपचार आयुर्वेदिक पद्धति से किया जाता है, जिसमें डायबिटीज भी एक है।

अगर आप Diabetes की समस्या से परेशान है तो नवग्रह आश्रम अवश्य जाना चाहिए।

Pavtan Pavtan
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