लिकोरिया की बीमारी क्या होती है? क्या इस बीमारी का कोई आयुर्वेदिक उपचार है?

महिलाओं में यौन और प्रजनन स्वास्थ्य की देखभाल बहुत जरूरी है। कई बार महिलाएं न चाहते हुए भी अपने स्वास्थ्य की अच्छे से देखभाल नहीं कर पाती है, ऐसे में उन्हें कई तरह की गंभीर समस्याओं का सामना करना पड़ता है।

लिकोरिया या व्हाइट डिस्चार्ज भी उन्हीं में से है। इस आर्टिकल में हम लिकोरिया के बारे में विस्तार से जानेंगे।

लिकोरिया की बीमारी क्या होती है?

लिकोरिया, जिसे सामान्य भाषा में श्वेत प्रदर या व्हाइट डिस्चार्ज भी कहा जाता है। यह एक स्त्री रोग है जिसमें योनि से सफेद या पीले रंग का स्राव (डिस्चार्ज) होता है। यह स्राव अगर सामान्य मात्रा में हो तो यह प्राकृतिक प्रक्रिया का हिस्सा है, लेकिन अत्यधिक या असामान्य स्राव होने लगे, तो यह गंभीर हो सकता है।

सामान्य रूप से व्हाइट डिस्चार्ज चिंता का विषय नहीं होता, लेकिन अगर इसकी मात्रा बढ़ जाए या इसके साथ अन्य लक्षण जैसे जलन, खुजली या दुर्गंध हो, तो यह किसी संक्रमण या अन्य स्वास्थ्य समस्या का संकेत हो सकता है। ऐसे में तुरंत डॉक्टर से सम्पर्क करना चाहिए।

लिकोरिया क्यों होता है?

लिकोरिया के कई कारण हो सकते हैं, जिनमें से कुछ प्रमुख कारण निम्नलिखित हैं।

  • हार्मोनल असंतुलन: शरीर में हार्मोन के असंतुलन के कारण भी अतिरिक्त डिस्चार्ज हो सकता है।
  • संक्रमण: बैक्टीरियल, फंगल या वायरल संक्रमण भी लिकोरिया का कारण बनते हैं।
  • गर्भावस्था: गर्भावस्था के दौरान हार्मोनल बदलावों के कारण भी लिकोरिया हो सकता है।
  • सेक्सुअली ट्रांसमिटेड इंफेक्शन्स (STIs): कुछ यौन संचारित रोग भी लिकोरिया का कारण बन सकते हैं।
  • खराब हाइजीन: गुप्तांग की स्वच्छता न रखने से भी संक्रमण और लिकोरिया हो सकता है।
  • योनिक अल्सर: गुप्तांग के अंदर घाव आदि होने से भी लिकोरिया की संभावना रहती है।
  • सेक्सुअल ट्रांसमिटेड डिजीज (STDs): वे बीमारियाँ जो यौन संपर्क के माध्यम से एक व्यक्ति से दूसरे व्यक्ति में फैलती हैं, उससे भी लिकोरिया संभव है।

लिकोरिया के लक्षण

  • योनि से अत्यधिक सफेद या पीला स्राव।
  • योनि में खुजली या जलन।
  • कमर और पेट में दर्द।
  • थकान और कमजोरी।
  • योनि में जलन या खुजली।
  • दुर्गंधयुक्त डिस्चार्ज।
  • पेट के निचले हिस्से में दर्द आदि।

लिकोरिया में कौनसी जांच की जाती है?

लिकोरिया का उपचार करने के लिए डॉक्टर आमतौर पर मरीज को जांचों की सलाह देते हैं, उनमें ये तीन प्रमुख हैं।

  • योनि का स्वाब टेस्ट
  • ब्लड टेस्ट
  • अल्ट्रासाउंड

लिकोरिया का आयुर्वेदिक उपचार क्या है?

आयुर्वेद में ऐसी जड़ी बुटियां मौजूद हैं, जो लिकोरिया में मरीज के लिए मददगार हो सकती है। इन जड़ी-बूटियों के उपयोग और जीवनशैली में सुधार से लिकोरिया को खत्म करने में मदद मिल सकती है। यहां हम आपको कुछ आयुर्वेदिक उपाय बता रहे हैं, जो लिकोरिया को ठीक करने में आपकी मदद कर सकते हैं।

  1. त्रिफला

त्रिफला बहुत ही गुणकारी आयुर्वेदिक मिश्रण है, जो तीन जड़ी बुटियों (आंवला, बिभीतकी, और हरितकी) से मिलकर बना होता है। यह शरीर को डिटॉक्स करने और पाचन तंत्र को मजबूत करने में मदद करता है। एक चम्मच त्रिफला पाउडर को रात में एक गिलास पानी के साथ लें। यह शरीर को डिटॉक्स करता है और योनि संक्रमण को भी कम करने में मददगार है।

  1. अशोक की छाल

अशोक की छाल महिलाओं के प्रजनन स्वास्थ्य के लिए बहुत फायदेमंद मानी जाती है। अशोक की छाल का पाउडर या काढ़ा तैयार करके दिन में दो बार इसका सेवन करें। यह गुप्तांग के हिस्सों को मजबूत करता है और अत्यधिक डिस्चार्ज को नियंत्रित करता है।

  1. लोध्र (Symplocos racemosa)

लोध्र आयुर्वेद में एक महत्वपूर्ण जड़ी-बूटी है, जो महिला प्रजनन स्वास्थ्य के लिए उपयोगी है। लोध्र पाउडर को पानी के साथ मिलाकर इसका पेस्ट बनाएं और दिन में दो बार इसका सेवन करें। यह श्वेत प्रदर को कम करने में मदद करता है।

  1. गुग्गुल (Commiphora mukul)

गुग्गुल शरीर के सूजन और संक्रमण को कम करने में सहायक होता है। गुग्गुल की गोलियां या पाउडर का पानी या दूध के साथ सेवन करें। यह संक्रमण से लड़ने में मदद करता है और श्वेत प्रदर को नियंत्रित करता है।

  1. चंदन (Sandalwood)

चंदन का शीतलन प्रभाव होता है और यह योनि की जलन को कम करने में मदद करता है। चंदन पाउडर को पानी या गुलाब जल में मिलाकर उसका पेस्ट बनाएं और इसे बाहरी रूप से योनि क्षेत्र पर लगाएं।

  1. योगाभ्यास

नियमित योग और प्राणायाम भी लिकोरिया को नियंत्रित करने में सहायक हो सकते हैं। मरीज को मस्त्यासन, भद्रासन, और सर्वांगासन जैसे योगासनों का नियमित अभ्यास करना चाहिए। ये आसन प्रजनन अंगों को मजबूत करने में मदद करते हैं।

लिकोरिया से बचाव के उपाय

  • जननांगों की उचित साफ सफाई रखें।
  • हरी सब्जियाँ, फल, और पौष्टिक आहार का सेवन करें।
  • दिन में पर्याप्त पानी पीएं।
  • नियमित योग और व्यायाम करें।
  • नियमित रूप से स्वास्थ्य जांच करवाएं।
  • मसालेदार, तले हुए, और जंक फूड से बचें।

उपरोक्त आर्टिकल आयुर्वेदिक उपचार और रोग के संबंध में सामान्य जानकारी के आधार पर हैं। किसी भी उपचार को शुरू करने से पहले डॉक्टर की सलाह अवश्य लें।

क्या आप भी गठिया दर्द से है परेशान? अपनाएं ये आयुर्वेदिक उपाय और पाए इस समस्या से छुटकारा

आप ने कभी न कभी गठिया रोग का नाम सुना होगा या फिर किसी बुजुर्ग से यह कहते अवश्य सुना होगा कि उनके घुटनों में दर्द रहता है। दरअसल, यही गठिया विकार है जो अक्सर पचास वर्ष की उम्र के आसपास के लोगों को होता है।

आज के इस आर्टिकल में हम गठिया विकार के बार में विस्तार से जानेंगे।

गठिया रोग क्या होता है?
गठिया रोग के क्या कारण होते हैं?
गठिया रोग की पहचान कैसे करे?
गठिया के दर्द के कम कैसे किया जा सकता है?
क्या गठिया रोग को आयुर्वेदिक उपायों से ठीक किया जा सकता है?

गठिया क्या है?

गठिया बेहद आम है, खासकर 50 वर्ष से अधिक उम्र के लोगों में होता है। गठिया एक ऐसी बीमारी है जो आपके जोड़ों को नुकसान पहुंचाती है। जोड़ शरीर के उस स्थान को कहा जाता है, जहाँ दो हड्डियाँ मिलती हैं। यं तो उम्र बढ़ने के साथ कुछ जोड़ स्वाभाविक रूप से घिसने लगते हैं। ऐसे में बहुत से लोगों को एक उम्र के बाद गठिया हो जाता है। लेकिन कई बार चोट लगने से भी गठिया हो जाता है। कुछ स्वास्थ्य स्थितियां भी गठिया का कारण बनती हैं।

गठिया किसी भी जोड़ को प्रभावित कर सकता है, लेकिन यह नीचे कुछ वे जोड़ बताएं जा रहे हैं, जो सबसे अधिक प्रभावित होते हैं।

  • हाथ और कलाई
  • घुटने
  • नितंब
  • पैर और टखने
  • कंधे
  • निचली पीठ (काठ की रीढ़) आदि।

गठिया रोग के क्या कारण होते हैं?

गठिया रोग होने के कारण निम्नलिखित हो सकते हैं।

बढ़ती उम्र

उम्र बढ़ने के साथ साथ हमारी हड्डियां भी कमज़ोर होने लगती हैं। तकरीबन 60 वर्ष की उम्र के बाद लोगों में यह समस्या देखने को मिलती है। हड्डियों पर शरीर का वज़न न आने से गठिया का खतरा बढ़ जाता है।

मोटापा

शरीर का वज़न बढ़ने से भी उसका प्रभाव जोड़ों पर पड़ता है। इसके चलते जोड़ों में दर्द और ऐंठन की समस्या बनी रहती है।

जेनेटिक

कई बार आनुवांशिक तौर पर भी गठिया का प्रभाव देखने को मिलता है। अगर परिवार का कोई भी सदस्य गठिया से ग्रस्त हो, तो ये आपको भी प्रभावित कर सकता है।

खराब खान पान

उचित खान पान न होना भी गठिया का एक प्रमुख कारण है। हेल्दी डाइट न लेने से लोग आटो इम्यून डिजीज के शिकार हो जाते हैं। ऐसे में सदैव पौष्टिक भोजन के अलावा एक्सरसाइज़ को भी अपने रूटीन में शामिल करना चाहिए।

चोट लगना

कई बार लगने वाली सामान्य चोट भी ऑस्टियो अर्थराइटिस का कारण बनती है। चोट लगने से कार्टिलेज का स्तर घटने लगता है। इससे शरीर कमज़ोर हो जाता है, और ये समस्या बढ़ जाती है।

गठिया रोग की पहचान कैसे करे? गठिया रोग के लक्षण क्या है?

गठिया रोग के कुछ प्रमुख लक्षण निम्नलिखित हैं।

  • जोड़ों में दर्द।
  • चलते-फिरते या उठते बैठते दर्द।
  • कठोरता।
  • सूजन।
  • त्वचा का रंग बदलना।
  • छूने पर दर्द।
  • जोड़ों के पास गर्माहट का एहसास आदि।

गठिया के दर्द को कम कैसे किया जा सकता है?

हम निम्नलिखित उपायों को अपनाकर गठिया के दर्द से राहत पा सकते हैं।

दवाओं का उपयोग: हम डॉक्टर से परामर्श लेकर दर्द निवारक आयुर्वेदिक या एलोपैथिक दवाओं का सेवन कर, दर्द से आराम पा सकते हैं।

बर्फ और गरम पानी की सिकाई: हम जोड़ों पर गरम पानी एवं बर्फ की सिकाई कर भी दर्द से एक बार छूटकारा पा सकते हैं।

योग और व्यायाम: हमें नियमित रूप से योग और व्यायाम करना चाहिए, जो गठिया के दर्द को कम करने में मददगार है।

आराम: यदि संभव हो आराम करें और जिन जोड़ों में दर्द रहता है, उस पर लगातार वजन नहीं डाले जैसे अगर पैरों के जोड़ों में दर्द है तो अधिक समय तक खड़ा नहीं रहे आदि।

संतुलित आहार: अपने भोजन में संतुलित एवं पौष्टिक आहार को शामिल करे। जिससे हड्डियां मजबूत हो एवं रोग प्रतिरोधक क्षमता बढ़े।

क्या गठिया रोग को आयुर्वेदिक उपायों से ठीक किया जा सकता हैं?

जी हां, हम कुछ आयुर्वेदिक उपायों को अपनाकर गठिया विकार से राहत प्राप्त कर सकते हैं, जो इस प्रकार हैं।

हल्दी : हल्दी गठिया के लिए एक बहुत ही गुणकारी है। हम हल्दी को नारियल या फिर सरसों के तेल में मिलाकर प्रभावित जगह पर लेप लगा सकते हैं। ऐसा करने से दर्द से राहत मिलेगी। इसके अलावा गठिया मरीजों के लिए हल्दी का सेवन भी बेहद गुणकारी है। हल्दी में पाया जाने वाला करक्यूमिन नामक तत्व शरीर से दर्द को खत्म करने में मदद करता है।

लहसुन : लहसुन को सरसों के तेल में गर्म करने के बाद उसे अपने जोड़ों पर इस्तेमाल कर सकते हैं। लहसुन में डायलिल डाइसल्फ़ाइड पाया जाता है, जो एंटी इन्फ्लेमेटरी गुणों से भरपूर होता है। जिससे आपको सूजन एवं दर्द से राहत मिलेगी।

अदरक : गठिया के दर्द से राहत पाने के लिए अदरक भी बेहद गुणकारी है। अदरक का पेस्ट अपने जोड़ों पर लगाने और अदरक का सेवन भी लाभकारी है। अदरक गठिया के रोगियों के लिए बेहद लाभकारी है।

गुग्गुलु : गठ‍िया रोग के ल‍िए गुग्गुलु का भी इस्‍तेमाल क‍िया जाता है। आयुर्वेद में गठ‍िया रोग के ल‍िए भुजंगासन, ताड़ासन, हलासन, पद्मासन और अर्धमत्स्येन्द्रासन आद‍ि को भी फायदेमंद माना जाता है।

आंखों के नीचे सूजन क्यों होती है? जानें इससे बचने के आयुर्वेदिक उपाय!

दोस्तों, आंखें हमारे शरीर का महत्वपूर्ण अंग होने के साथ ही, सुन्दर दिखने में भी मदद करती हैं। लेकिन कई बार हमारी आंखों में कुछ गिर जाने, संक्रमण या अन्य किसी स्थिति से आंखों के नीचे और हड्डी के ऊपर सूजन आ जाती है।

यह सूजन न सिर्फ हमें परेशान करती है, बल्कि सुन्दरता में भी बाधा डालती है। साथ ही अगर सूजन के कारणों की पहचान कर समय पर डॉक्टर से परामर्श नहीं लिया जाए तो यह समस्या गंभीर भी हो सकती है। ऐसे में आज इस आर्टिकल में हम आंखों के नीचे सूजन आने के कारणों, लक्षणों और आयुर्वेदिक उपायों के बारे में जानेंगे।

आंखों के नीचे सूजन क्यों होती है?

आंखों के नीचे सूजन की समस्‍या को आई बैग्‍स के नाम से जाना जाता है। मेड‍िकल भाषा में इसका नाम पेर‍िऑरब‍िटल एड‍िमा है। आंखों के नीचे सूजन आने के कई कारण हो सकते हैं, जिसके आधार पर यह गंभीर है या सामान्य, इसकी पहचान की जा सकती है।

आंखों की हड्डियों के ऊपर नजर आने वाली सूजन को तब हल्‍के में नहीं लेना चाहिए, जब वह अधिक समय तक रहे। आंखों के नीचे सूजन कई कारणों से हो सकती है। यदि किसी व्यक्ति की आंखों के नीचे हड्डियों पर सूजन है, सांस लेने में कठिनाई हो रही है और साथ में गंभीर दर्द भी हो रहा है, तो उन्हें तत्काल चिकित्सा सहायता लेनी चाहिए।

आंखों के नीचे सूजन के कारण – Eye Bags Causes

आंख में संक्रमण –आंख में संक्रमण के कारण भी आंखों के नीचे सूजन आ जाती है। संक्रमण, एक आंख से दूसरी में भी फैल सकता है।

आंखों के आसपास तरल पदार्थ जमा होना – जब आंखों के आसपास तरल पदार्थ जमा होता है, तो उसके कारण भी आई बैग्‍स की समस्‍या हो सकती है।

नमक का अधिक सेवन – नमक का अधिक सेवन करने पर भी आई बैग्‍स या आंखों के नीचे सूजन आ सकती है।

प्रदूषण या धूल – प्रदूषण या आंखों में धूल चली जाने पर भी एलर्जी के कारण आंख के नीचे सूजन हो सकती है।

नींद पूरी नहीं होना –अगर आपकी नींद पूरी नहीं होती है, तो भी आंख के नीचे सूजन आ सकती है।

अधिक रोना – कई बार अधिक रोने से भी आंखों के नीचे सूजन आ जाती है।

शरीर में पानी की कमी –ऐसा देखने में आता है कि शरीर में पानी की कमी से भी आंखों के नीचवे सूजन आ सकती है।

धूम्रपान का सेवन –धूम्रपान करने से भी आंखों के नीचे सूजन आ सकती है।

बढ़ती उम्र – बढ़ती उम्र के साथ आंखों के ऊतक कमजोर होते हैं और फैट न‍िचली पलकों पर चला जाता है, ज‍िससे भी आंखों के नीचे सूजन नजर आती है।

कैसे पहचाने की आँख में सूजन हो रही हैं?

आंखों में सूजन कई विभिन्न कारणों से हो सकती है, जैसे कि अलर्जी, संक्रमण, या आंखों की चोट आदि। यदि आपकी आंखों में सूजन हो रही है, तो निम्नलिखित कुछ लक्षण हो सकते हैं:

  • आंखों के आसपास लाली या सूजन।
  • आंखों से पानी या गिड़ निकलना।
  • आंखों में खुजली या जलन।
  • अस्पष्टता का कम दिखाई पड़ना।
  • आंख में धुंधलापन या ब्लरिंग।

आंख में सूजन होना क्या कोई गंभीर समस्या का संकेत हैं?

दरअसल, ऐसा आंखों के नीचे सूजन के कारणों की स्थिति पर निर्भर करता है। अगर सूजन सामान्य है, तो यह एक दो दिन में ठीक हो जाता है। इनमें हम नींद पूरी नहीं होना जैसे कारण शामिल करते हैं। लेकिन अगर सूजन दो से ​अधिक दिनों तक रहती है तो यह गंभीर हो सकता है। ऐसे में समय पर चिकित्सक से परामर्श अवश्य लेना चाहिए।

यहां हम कुछ ऐसे कारणों को जानेंगे, जिसकी वजह से आंखों की सूजन गंभीर हो सकती है।

  • संक्रमण: अगर आंखों की सूजन का प्रमुख कारण संक्रमण है तो यह गंभीर हो सकता है।
  • धूल : धूल, या अन्य पदार्थों के आंख में प्रवेश करने से भी सूजन आ सकती है, जोकि गंभीर हो सकता है।
  • चोट लगना: अगर आपकी आंखों में चोट लगी है, तो इससे भी आई सूजन गंभीर हो सकती है।
  • आंख की एलर्जी: कभी-कभी आंखों को किसी विशेष पदार्थ के प्रति अतिरिक्त संवेदनशीलता हो सकती है, जिससे आंखों में सूजन और खुजली हो सकती है। जो भी गंभीर हो सकती है।
  • ग्लौकोमा: यह आंख के रक्तचाप का एक संकेत हो सकता है, जिससे आंख में सूजन और दर्द हो सकता है। इसकी वजह से आई सूजन भी गंभीर हो सकती है।
  • अन्य समस्याएं: आंख की सूजन कई अन्य गंभीर समस्याओं का भी संकेत हो सकती हैं, जैसे आंख का कैंसर या आंख की रोगों में समस्याएं।

आंख में सूजन होने पर कब डॉक्टर को दिखाना चाहिए?

आंख में सूजन होने पर निम्नलिखित स्थितियों में डॉक्टर से परामर्श लेना चाहिए:

  • अगर सूजन तेजी से बढ़ रही है: यदि आपकी आंख की सूजन तेजी से बढ़ रही है, तो आपको तुरंत डॉक्टर से मिलना चाहिए।
  • जब सूजन के साथ दर्द हो: यदि आपकी आंख में सूजन के साथ दर्द या असहनीय है, तो डॉक्टर से संपर्क करें।
  • जब सूजन के साथ दिखना कम हो: यदि आपकी आंख में सूजन के साथ दिखने में कोई भी बदलाव हो, तो तुरंत डॉक्टर से परामर्श करें।
  • यदि आंख के आसपास चिकनाहट या हीट लगे : यदि आपकी आंख के आसपास चिकनाहट या गर्मी महसूस हो, तो तुरंत डॉक्टर से संपर्क करें।
  • अगर आंख से पानी आए: यदि आपकी आंख से पानी आए, तो डॉक्टर से सम्पर्क अवश्य करें।
  • अगर बुखार या चक्कर आए: यदि आंख के नीचे सूजन के साथ बुखार या चक्कर आए, तो डॉक्टर को अवश्य दिखाए।

क्या आंख में सूजन से बचने का कोई आयुर्वेदिक इलाज हैं?

अब हम आंख के सूजन को ठीक करने के आयुर्वेदिक उपायों के बारे में जानेंगे।

टी बैग का इस्तेमाल : आंख की सूजन को कम करने के लिए आप एंटी इंफ्लेमेटरी गुणों से युक्त टी बैग का इस्तेमाल कर सकते हैं। आप टी बैग को भिगोकर आधे घंटे के लिए फ्रिज में रख दें फिर आंख पर 5 से 10 मिनट के लिए रखें, इससे सूजन में आराम मिलेगा।

बेकिंग सोडा : बेकिंग सोडा भी सूजन को कम करने में सहायक होता है। इसके लिए 1 चम्मच सोडा को आधे कप पानी में मिलाकर रूई की मदद से आंखों पर रखें, यह आपको राहत देगा।

खीरा : खीरा सबसे असरदार तरीका है आंखों की स्वैलिंग ठीक करने के लिए। खीरा के दो टुकड़ों को आंखों पर रखकर कुछ देर लेट जाएं, इससे आपको काफी हद तक राहत महसूस होगी।

एलोवेरा : एलोवेरा भी आंखों की सूजन को कम करने में बहुत सहायक होता है। इससे ब्लड सर्कुलेशन बेहतर होता है और आंखों की सूजन से राहत मिलती है।

आलू : आलू का इस्तेमाल भी आंखों की सूजन को कम करने में किया जाता है। इसके लिए आलू के स्लाइस को सूती कपड़े में बांधकर आखों पर रखना चाहिए।

आंखों की सूजन से बचाय के उपाय

  • आंखों को साफ रखें
  • धूप का चश्मा पहनें
  • पर्याप्त मात्रा में पानी पिएं
  • पर्याप्त नींद निकालें
  • नमक का कम सेवन आदि।

इस आर्टिकल में आपने आंखों के नीचे सूजन के कारणों, लक्षण और आयुर्वेदिक उपायों के बारे में जाना। अगर आप इस समस्या से ग्रसित हैं तो डॉक्टर से परामर्श अवश्य लें।

नकसीर या नाक से खून बहने की समस्या क्यों होती है? जानें इसके आयुर्वेदिक इलाज के बारे में

कभी न कभी आप नाक से खून बहने की समस्या से अवश्य गुजरे होंगे। यूं तो यह एक सामान्य समस्या है, लेकिन अगर बार बार नाक से खून आए तो गंभीर भी हो सकती है। ऐसे में आज हम इस आर्टिकल में नकसीर की समस्या, कारण और इसकी रोकथाम के आयुर्वेदिक उपायों के बारे में जानेंगे।

नकसीर की समस्या क्या होती है?

नकसीर का अर्थ होता है नाक से खून का बहना। यह एक सामान्य चिकित्सा समस्या है जो कई कारणों से हो सकती है, जैसे कि नाक की चोट, नाक के अंदरी इंजेक्शन, नाक के पास की किसी नस का फटना, या नाक की शारीरिक संरचना में कोई गड़बड़ी होना।

नकसीर को अंग्रेज़ी में ‘Epistaxis’ कहा जाता है, और यह नाक से रक्तस्राव की स्थिति है। यह एक सामान्य रोग है जो किसी भी उम्र के लोगों में हो सकता है। सामान्य रूप से, नकसीर आमतौर पर स्वयं ही समाप्त हो जाती है, लेकिन कभी-कभी यह गंभीर हो सकती है और चिकित्सा की आवश्यकता होती है।

हालांकि, लंबे समय तक नकसीर का सामना करने वाले लोगों को चिकित्सक की सलाह लेनी चाहिए, क्योंकि यह किसी गंभीर स्वास्थ्य समस्या का संकेत भी हो सकता है।

नाक से खून बहने के कारण क्या हैं?

नाक से खून आना गंभीर और सामान्य, दोनों प्रकार की स्थिति है। नाक से खून आना कितना गंभीर है यह व्यक्ति की अवस्था पर निर्भर करता है। नाक में कई रक्त वाहिकाएं मौजूद होती हैं, जो नाक के आगे और पीछे की सतह के पास स्थित होती हैं और ये काफी नाजुक भी होती हैं, यही कारण है कि कई बार आसानी से इससे खून बहने लगता है। गर्मी के ​दिनों में ऐसा अधिक देखने को मिलता है। 3 वर्ष से 10 वर्ष तक की आयु के बच्चों में नकसीर की समस्या बहुत आम है।

अगर हम बात करें कि नाक से खून क्यों आता है। तो इसका आसान जवाब यह है कि नाक से खून बहने की समस्या नाक की रक्त वाहिकाओं में रक्तस्राव की वजह से होती है। इसका सबसे मुख्य कारण नाक में उपस्थित झिल्ली का सूख जाना या नाक में चोट लगना है।

आमतौर पर नकसीर की समस्या स्वत: ही ठीक हो जाती है। लेकिन यह समस्या अगर बार-बार हो रही है तो इसका कारण खून की कमी यानी एनीमिया भी हो सकता है। ऐसे में चिकित्सक की सलाह अवश्य लेनी चाहिए।

नकसीर की समस्या का अधिक खतरा किसे है?

बार-बार उंगली डालकर नाक साफ करना, संक्रमण, हाइपरटेंशन यानी तनाव, बीपी बढ़ने या खून पतला करने वाली दवाओं का सेवन करने वाले रोगियों को नकसीर की समस्या अधिक रहती है।
इसके अलावा एनीमिया, आईटीपी में प्लेटलेट्स घटने और ब्लड कैंसर के रोगियों में भी ये समस्या देखने को मिलती है, लेकिन ऐसे कुछ ही मामलों में होता है।

नाक से खून क्यों बहता है?

आम तौर पर नाक से खून बहने के दो कारण होते हैं। नाक को किसी कठोर चीज से खुजलाना या किसी नुकीली चीज से नाक को साफ करना और दूसरा गर्मी की वजह से भी यह समस्या देखने को मिलती है। गर्मी में नाक से खून आना बहुत सामान्य घटना है। ऐसा हम सब कभी न कभी अनुभव कर चुके हैं कि गर्मी की वज​ह से नाक में खून आया हो। साथ ही शुष्क हवा की वजह से जब नाक की झिल्ली सूख जाती है, तब भी नाक से खून आता है। यह गर्मी की वजह से खून आने की समस्या का ही दूसरा रूप है।

नाक से खून बहने के अन्य कारण

  • शराब का अधिक सेवन करना
  • नाक में ट्यूमर
  • विटामिंस की कमी
  • हेमोफिलिया
  • रक्त पतला करने वाली दवाओं का सेवन
  • दवाओं का दुष्प्रभाव
  • कोकीन का सेवन
  • बार बार नाक का बहना
  • नाक में गंभीर प्रकार की चोट
  • नाक में दवा का स्प्रे आदि।

नकसीर से बचने के कुछ घरेलु उपाय:

सिर में ठंडा पानी डाले – नाक से खून बहने के दौरान सिर को झूकाकर ठंडे पानी को सिर पर धार बनाकर डालेंगे तो नाक से खून बहना बंद हो सकता है।

शरीर में पानी की पूर्ति- शरीर में पानी की कमी से भी नाक में रक्तस्राव की समस्या हो सकती है। ऐसे में इस समस्या से छूटकारा पाने के लिए गर्मी के मौसम में अधिक से अधिक पानी पीना और तरल पदार्थों का सेवन करना फायदेमंद होता है।

बर्फ की सिकाई – नाक से खून बहने पर बर्फ के टुकड़े को कपड़े से लपेटकर, इसे नाक पर लगाकर 4 से 5 मिनट तक सिकाई करें, इससे रक्तस्राव रुक जाता है।

विटामिन ई- एक विटामिन ई का कैप्‍सूल लेकर उसका तेल एक कटोरी में निकाल लें, बाद में इस तेल को नथुनों पर लगाकर रातभर के लिए छोड़ दें। इससे भी नाक से रक्तस्त्राव की समस्या से आराम मिलता है।

भाप – भाप लेने से भी नाक से रक्तस्त्राव से आराम मिलता है। भाप लेने से नाक गुहा में नमी बनती है और सूखापन हट जाता है, जिससे रक्त बहना बंद हो जाता है।

यह कुछ उपाय अपनाकर आप नाक से खून बहने की समस्या से निजात एवं आराम पा सकते हैं। लेकिन अगर यह समस्या बार बार हो रही है, तो ऐसी ​स्थिति में चिकित्सक से सम्पर्क अवश्य करना चाहिए।

नकसीर की समस्या का आयुर्वेदिक उपचार

पीपल के पत्ते

आयुर्वेद के अनुसार, पीपल के पत्ते घाव को जल्दी भरने, सूजन कम करने और त्वचा को हील करने में मददगार हैं। नाक से खून आने की समस्या में पीपल के पत्ते को पीसकर, उसके रस की 5-7 बूंदें नाक में डालने से राहत मिलती है।

घी का इस्तेमाल

नकसीर से राहत पाने के लिए घी भी उपयोगी है। घी में मौजूद गुण नाक की ड्राईनेस को कम करते हैं। इससे नाक से खून निकलने की परेशानी से छुटकारा मिल सकता है।

शीशम

आयुर्वेद में शीशम के पत्तों, जड़ और छाल का विशेष महत्व है। नकसीर की समस्या में शीशम के पत्तों के रस की कुछ बूंदों को नाक में डालने से खून बहना बंद हो जाता है।

बेल

नकसीर की समस्या से निजात पाने के लिए बेल के पत्तों को पानी में उबालकर, इसमें मिश्री मिलाकर पिएं। इसके नियमित सेवन से लाभ होगा।

क्या आप भी सफेद दाग से है परेशान? अपनाएं ये आयुर्वेदिक उपाय और पाए इससे छुटकारा

अक्सर हमें चेहरे से जुड़ी कई तरह की समस्याएं होती हैं, जिनमें सबसे आम पिम्पल्स, दाग-धब्बे यार फिर ड्राइनेस। ये समस्याएं काफी आम होती हैं लेकिन इन समस्याओं के अलावा काफी लोगों के चेहरे पर सफेद दाग और पैच हो जाते हैं, जिन्हें सहुआ भी कहा जाता है, जोकि लम्बे समय तक या समय पर उपचार नहीं कराया जाए तो आजीवन रह सकते हैं। दरअसल, ये हमारी त्वचा पर एक तरह के फंगल इन्फेक्शन होता है, जो की सामान्य परेशानियों में से एक है, लेकिन इस पर ध्यान देना बेहद जरूरी है।

शरीर पर सफेद दाग के कारण क्या है?

शरीर पर सफेद दाग होने को अंग्रेजी में विटिलिगो कहा जाता है। हम सभी ने अपनी जिंदगी में एक न एक बार विटिलिगो से पीड़ित व्यक्ति को अवश्य देखा होगा। ऐसा देखा जाता है कि उनके शरीर के लगभग सभी अंगों पर सफेद धब्बे होते हैं, जो ज्यादातर पैरों, चेहरे, और हाथों पर दिखते हैं।

दरअसल, विटिलिगो यानी सफेद दाग होना त्वचा से संबंधित बीमारियों में से एक बीमारी है, जो खून से संबंधित एलर्जी, गलत खाना-पीना और स्किन इन्फेक्शन के कारण होती है।

सफेद दाग क्यों होते हैं? सफेद दाग के कारण क्या है?

शरीर पर सफेद दाग के कई कारण हो सकते हैं, जो निम्नलिखित हैं।

लेकोडर्मा: इस बीमारी से पीड़ित होने पर त्वचा पर सफेद दाग बनते हैं। इसमें त्वचा के कुछ हिस्से में मेलानोसाइट्स यानी त्वचा के रंग को नियंत्रित करने वाले कोशिकाओं की कमी होती है, जिसके कारण सफेद दाग बनते हैं। यह अधिकांशतः गर्मी या सूर्य के प्रभाव से होता है।

विटिलिगो: यह भी एक और त्वचा रोग है जिसमें भी मेलनोसाइट्स नामक कोशिकाओं की कमी होती है, और त्वचा पर सफेद दाग बनते हैं।

स्कैबिज: यह एक प्रकार का कीटाणु संक्रमण है, जिसमें त्वचा पर छोटे छोटे चकत्ते वाले दाग बनते हैं।

फंगल इन्फेक्शन: त्वचा पर सफेद दाग बनने का एक कारण फंगल इन्फेक्शन भी हो सकता है।

लेकोप्लेकिया: इस रोग में भी शरीर के कुछ हिस्सों की मेलनोसाइट्स की संख्या कम होती है, जिससे सफेद दाग बनते हैं।

वंशानुगत: वंशानुगत कारणों से भी त्वचा पर सफेद दाग बनते हैं।

अन्य कारण: त्वचा का अधिक धूप, तनाव या औद्योगिक केमिकल्स के संपर्क में आना।

शरीर पर सफेद दाग के लक्षण क्या है?

शरीर पर सफेद दाग के लक्षण बीमारियों के अनुसार अलग अलग हो सकते हैं। कुछ सामान्य लक्षण निम्नलिखित हैं।

  • खुजली: सफेद दाग के साथ खुजली या खुजली वाली जगह पर बाद में सफेद दाग का बनना।
  • त्वचा पर सफेद दाग: शरीर के अलग-अलग हिस्सों पर सफेद रंग के छोटे या बड़े दाग दिखना।
  • त्वचा का रंग बदलना: यदि त्वचा के किसी भाग का रंग बदलता है और वह सफेद हो सकता है तो यह सफेद दाग का लक्षण हो सकता है।
  • अन्य त्वचा समस्याएं: उपरोक्त के अलावा सूखापन, फैलाव, या त्वचा की परेशानी हो सकती है, जिसे भी लक्षण के रूप में देखा जा सकता है।

सफेद दाग कितने प्रकार के होते हैं?

सफेद दाग या विटिलिगो का प्रकार, दाग के रंग और उसके आकार पर निर्भर करता है, जिसे इस प्रकार समझ सकते हैं।

यूनिवर्सल विटिलिगो: यह शरीर के किसी भी भाग में हो सकता है। इस प्रकार का सफेद दाग चेहरे से लेकर पैरों तक सभी जगह पर होता है।

सेगमेंटल विटिलिगो: यह शरीर के किसी खास हिस्से में ही होता है। आमतौर पर यह 1 से 2 साल तक फैलता है।

सामान्यीकृत विटिलिगो: यह विटिलिगो सबसे आम प्रकार है, जो शरीर के किसी भी भाग पर हो सकता है और कभी भी बढ़कर रुक भी सकता है।

फोकल विटिलिगो: यह फोकल विटिलिगो आकार में छोटा होता है और शरीर के किसी एक खास भाग को ही प्रभावित करता है।

एग्रोफेशियल विटिलिगो: यह विटिलिगो खासकर चेहरे पर होता है और कभी-कभी हाथों पैरों पर देखने को मिलता है।

शरीर पर सफेद दाग कब तक ठीक होते हैं?

सफेद दाग का ठीक होना उसके कारणों पर निर्भर करता है। रोग का प्रकार, रोग का स्थान, रोग की गंभीरता, और उपचार के आधार पर ही इसके ठीक होने का अनुमान लगाया जा सकता है। साथ ही सफेद दाग को ठीक करने के लिए उपचार के तरीके भी ​अलग अलग सकते हैं और इसमें समय लग सकता है।

वहीं, ऐसा भी देखा जाता है कि सही उपचार के प्रयासों के बावजूद भी सफेद दाग पूरी तरह से ठीक नहीं हो पाते हैं। यह स्थिति जीवनभर रह सकती है या कुछ समय के लिए रुक कर फिर से बढ़ सकती है।

शरीर पर सफेद दाग का आयुर्वेदिक उपचार क्या है?

आयुर्वेद में सफेद दाग के उपचार के लिए कई उपाय बताए गए हैं, जो सफेद दाग की बीमारी से छूटकारा पाने में मददगार साबित हो सकते हैं।

नीम: नीम की पत्तियों को पानी में उबालकर उस पानी को सफेद दाग पर लगाने से इसमें सुधार हो सकता है। नीम के पत्ते, नीम का तेल या नीम का छाल भी अत्यंत उपयुक्त माने जाते हैं।

तुलसी: तुलसी के पत्ते को पीसकर उनका रस निकालकर, सफेद दाग पर लगाना भी मददगार हो सकता है।

हल्दी: हल्दी में मौजूद कुर्कुमिन के गुणों के कारण, इसका उपयोग सफेद दाग के उपचार में किया जा सकता है।

नींबू का रस: नींबू का रस सफेद दाग के लिए एक प्रमुख और प्रभावी उपचार है। इसे नियमित रूप से सफेद दाग पर लगाने से उसका रंग धीरे-धीरे कम होता है।

अम्ली पदार्थों का उपयोग: अम्लीय पदार्थों का उपयोग सफेद दाग के इलाज में किया जा सकता है। आंवला, टमाटर, या दही का सेवन करना इसमें सहायक हो सकता है।

खीरा का पेस्ट: खीरे को पीसकर उसका पेस्ट बनाकर सफेद दाग पर लगाने से इसमें सुधार हो सकता है।

गंधक: गंधक को तेल के साथ मिलाकर मिश्रण को सफेद दाग पर लगाने से इसमें लाभ हो सकता है।

आम के पत्ते: आम के पत्तों और त्वचा को सफेद दाग पर लगाने से फायदा हो सकता है।

आमला: आमला के रस का सेवन करने से भी त्वचा के स्वास्थ्य में सुधार हो सकता है, जो सफेद दाग को कम करने में मदद करता है।

पुदीना: पुदीने के पत्ते को पीसकर उसके रस को सफेद दाग पर लगाने से लाभ हो सकता है।

आंतों में सूजन का आयुर्वेदिक इलाज: क्या है इसका कारण और उपचार?

पेट हमारे शरीर का वह अंग है, जो अगर प्रभावित हो जाए तो शरीर थकान और कई बीमारियों से गिर जाता है। इसलिए शरीर को स्वस्थ रखने के लिए पेट का ख्याल रखना बहुत आवश्यक है लेकिन कई बार हमारी खराब दिनचर्या के चलते पेट पर बूरा प्रभाव पड़ता है और उसमें कोई न कोई बीमारी जन्म ले लेती है।

पेट से जुड़ा ऐसा ही एक विकार है आंतों की सूजन। अगर हमारी आंतों में सूजन आ जाए तो हमें कई प्रकार की परेशानियों का सामना करना पड़ता है। दरअसल, आंतें भी हमारे शरीर का प्रमुख अंग हैं। हम जो भोजन ग्रहण करते है वह आंतों से ​होकर ही मलद्वार तक पहुंचता है। हमारी आंतें पेट से भोजन और तरल पदार्थ प्राप्त कर उसे पचाने और अवशोषित करने का कार्य करती है।

इस आर्टिकल में हम आंतों में सूजन आने के कारण और उपचार के बारे में जानेंगे। साथ ही हम आपको आंतों में सूजन के आयुर्वेदिक उपचार के बारे में भी बताएंगे।

आंतों में सूजन के लक्षण क्या है?

आंतों में सूजन के लक्षण निम्नलिखित हैं।

  • खून का मवाद के साथ लगातार दस्त।
  • पेट में दर्द और ऐंठन रहना।
  • रेक्टल का दर्द होना।
  • मल के साथ खून का निकलना।
  • शौच की तीव्र इच्छा होना।
  • शौच करने में असमर्थता।
  • वजन कम होना।
  • थकान रहना।
  • बुखार आना।
  • सिरदर्द।
  • गहरे रंग का मूत्र आना।
  • बीपी लो होना।
  • उल्टी की शिकायत आदि।

आंतों में सूजन के कारण क्या है?

आंतों में सूजन के कई कारण हो सकते हैं, जिनमें सबसे सामान्य कारण शामिल हैं:

  • गैस या एसिडिटी: अगर आपकी आंतों में गैस या एसिडिटी की समस्या है, तो यह आपकी आंतों में सूजन का कारण बन सकती है।
  • आंतों में इंफेक्शन: आंतों में इंफेक्शन, जैसे कि पेट के किसी हिस्से में बैक्टीरिया या वायरस का प्रवेश, भी सूजन का कारण बन सकता है।
  • गांठियाँ (अल्सर): आंतों में अल्सर या गांठियाँ होने पर भी सूजन हो सकती है।
  • आंतों की आघात: अगर आपकी आंतों में चोट या आघात हुआ है, तो यह भी सूजन का कारण बन सकता है।
  • पाचन संबंधी समस्याएँ: पाचन संबंधी समस्याओं, जैसे कि गैस्ट्राइटिस या क्रोन रोग, भी आंतों में सूजन का कारण बन सकती हैं।

आंतों में सूजन का आयुर्वेदिक इलाज क्या हैं?

आयुर्वेद में आंतों में सूजन का इलाज करने के लिए कई प्राकृतिक उपचार हो सकते हैं। यहाँ कुछ आयुर्वेदिक उपाय दिए जा रहे हैं जो आंतों की सूजन को कम करने में मदद कर सकते हैं:

  • त्रिफला (Triphala): त्रिफला भी पाचन को सुधारने और आंतों की सूजन को कम करने में सहायक हो सकती है।
  • गुड़ूची (Giloy): गुड़ूची आंतों की सूजन को कम करने में मदद कर सकती है। इसे गर्म पानी के साथ सेवन किया जा सकता है।
  • धनिया और जीरा: धनिया और जीरा का उपयोग भी आंतों की सूजन को कम करने में मदद कर सकता है।
  • पुदीना: पुदीना का रस भी आंतों की सूजन को कम करने में लाभदायक हो सकता है।
  • आंति दोषनाशक चूर्ण: आंति दोषनाशक चूर्ण का सेवन भी सूजन को कम करने में मदद कर सकता है।

आंतों में सूजन के दौरान क्या खाना चाहिए?

जब आपको आंतों में सूजन की समस्या होती है, तो आपको उपचार के साथ-साथ सही आहार का भी ध्यान रखना चाहिए। यहां कुछ आहार के बारे में जानकारी दी जा रही है जो आंतों में सूजन के दौरान सेवन किया जा सकता है:

खाना पचाने वाले आहार: पाचन को सुधारने के लिए हल्का और आसानी से पचने वाला आहार लें। इसमें अनाज, दाल, फल, सब्जियाँ, और दूध के उत्पाद शामिल हो सकते हैं।

प्रोटीन और विटामिन युक्त आहार: आंतों की सूजन के दौरान, प्रोटीन और विटामिन युक्त आहार खाना महत्वपूर्ण होता है। इसमें मसूर, मूंग, सोया, दूध, पनीर, दही, हरी सब्जियाँ, और फल शामिल हो सकते हैं।

हरी सब्जियाँ: हरी सब्जियाँ जैसे कि पालक, मेथी, टमाटर, और गोभी आंतों की सूजन को कम करने में मदद कर सकती हैं।

फल: फल और उनके जूस जैसे कि सेब, केला, संतरा, और नारंगी भी पाचन को सुधारने में मदद कर सकते हैं।

अनाज और दलिया: अनाज और दलिया जैसे उच्च फाइबर वाले आहार आपकी पाचन को सुधार सकते हैं और सूजन को कम करने में मदद कर सकते हैं।

आंतों में सूजन से बचाव के उपाय?

आंतों में सूजन से बचाव के लिए निम्नलिखित उपायों को अपनाना फायदेमंद हो सकता है:

स्वस्थ आहार: स्वस्थ और पाचन सही आहार लेना बहुत महत्वपूर्ण है। यहां ताजे फल, सब्जियां, अनाज, दलिया, प्रोटीन, और फाइबर युक्त आहार शामिल होना चाहिए।

हाइड्रेशन: पर्याप्त पानी पीना आंतों के स्वास्थ्य के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण है। सही हाइड्रेशन आपके पाचन को सुधार सकता है और सूजन से बचाव कर सकता है।

नियमित व्यायाम: नियमित व्यायाम करना आपके पाचन को सुधार सकता है और सूजन से बचाव कर सकता है। योग, प्राणायाम, और ध्यान भी यहां मददगार हो सकते हैं।

स्ट्रेस कम करें: स्ट्रेस आपके पाचन को प्रभावित कर सकता है और आंतों में सूजन को बढ़ा सकता है। स्ट्रेस को कम करने के लिए मेडिटेशन, योग, या अन्य संशोधन तकनीकों का उपयोग करें।

अधिक समय बैठे न रहें: अधिक समय बैठे रहने से आंतों में सूजन का खतरा बढ़ जाता है। नियमित अंतरालों में उठें और थोड़े समय के लिए चलें या बैठें।

समय पर खाएं: विशेष रूप से रात के खाने को समय पर खाएं और सोने से कम समय पहले खाना खाएं।

अल्कोहल और धूम्रपान का प्रतिबंध: अधिक मात्रा में अल्कोहल और धूम्रपान का सेवन आंतों के स्वास्थ्य को बिगाड़ सकता है। इसलिए इनका सेवन कम करें या बिल्कुल छोड़ दें।

यदि आपको आंतों में सूजन की समस्या है, तो उपरोक्त लक्षणों, कारणों एवं सुझावों का पालन करने के साथ डॉक्टर की सलाह अवश्य लें।

क्या आप भी सोरायसिस की समस्या से पीड़ित है? अपनाएं ये आयुर्वेदिक नुस्खे और पाएं इस बीमारी से छुटकारा

क्या आप भी सोरायसिस की समस्या से पीड़ित है? अपनाएं ये आयुर्वेदिक नुस्खे और पाएं इस बीमारी से छुटकारा

त्वचा हमारे शरीर की ऐसी अभिन्न अंग है, जो हमें हवा और स्पर्श को महसूस करने में भी मदद करती है। आयुर्वेद की मानें तो त्वचा रक्त धातु से बनती है एवं त्वचा से जुड़े विकारों को कुष्ठ रोग कहा जाता है। ऐसा ही एक त्वचा से जुड़ा रोग सोयरासिस है, जिसके बारे में जानना जरुरी है। आज के आर्टिकल में हम इसी के बारे में विस्तार से जानेंगे।

सोरायसिस रोग क्या होते हैं?

सोरायसिस त्वचा से जुड़ी एक बीमारी है, जिसमें त्वचा पर लाल रंग के पपड़ीदार चकत्ते बनने लगते हैं। यह रोग ज़्यादातर जवान या बड़े उम्र के लोगों में देखने को मिलता है। लेकिन कभी कभार कम उम्र में भी यह समस्या देखी जा सकती है। सोरायसिस से महिलाएं और पुरुष दोनों समान रूप से प्रभावित होते हैं। यहाँ एक बात और है कि सोरायसिस किसी तरह का संक्रमण नहीं है, और न ही यह कोई संक्रामक है यानी यह छूने या हाथ मिलाने से नहीं फैलता है।

जैसा कि यह त्वचा रोग छूने या हाथ मिलाने से नहीं फैलता, इसके बावजूद पीड़ित को कई तरह के समस्याओं का सामना करना पड़ता है। कई बार यह किसी व्यक्ति के भावनात्मक, मानसिक स्वास्थ्य और रिश्तों को भी प्रभावित कर देता है। चिकित्सा विज्ञान अब तक सोरायसिस के असल कारण तक नहीं पहुंच पाया है, लेकिन भी कुछ सामान्य कारण हैं जो सोरायसिस के लक्षणों को प्रभावित कर सकते हैं। अकसर कहा जाता है कि यदि परिवार में किसी को सोरायसिस है, तो अगली पीढ़ी में सोरायसिस रोग होने की संभावना बढ़ जाती है।

सोरायसिस रोग होने के क्या क्या कारण होते हैं?

यूँ तो आमतौर पर सोरायसिस रोग होने के एक बड़ा कारण आनुवंशिक है। लेकिन इसके अलावा भी कई ऐसे कारण हैं, जिससे यह रोग हो सकता है। आइए, हम इस रोग के कारणों के बारे में जानते हैं।

तनाव

मानसिक तनाव सोरायसिस के प्रमुख कारणों में से सबसे आम है। हम तनाव के कारणों पर नियंत्रित कर सोरायसिस रोग से खुद का बचाव कर सकते हैं।

चोट लगना

सोरायसिस उन जगहों पर भी हो सकता है जहाँ पर हमारी त्वचा को चोट पहुंची है। खरोंच, सनबर्न, कीड़ो के काटने और टीका लगने से हुए घाव पर भी सोरायसिस रोग हो सकता है या बढ़ सकता है।

इन्फेक्शन

त्वचा से जुड़ा किसी भी प्रकार का इन्फेक्शन सोरायसिस रोग को बढ़ा सकता है। ऐसे में जरुरी है कि किसी भी प्रकार का इन्फेक्शन होने पर तुरंत अपना उपचार करवाएं।

मौसम

मौसम का भी सोरायसिस से सम्बन्ध है। सर्दी और बारिश के समय का कोई घाव या चोट सोरायसिस को प्रभावित कर सकता है। ठंडा मौसम सोरायसिस को बढ़ा सकता है।

स्मोकिंग

स्मोकिंग या धूम्रपान भी सोरायसिस का एक कारण माना गया है। इसलिए सोरायसिस से बचाव के लिए धूम्रपान छोड़ने की सलाह दी जाती है।

सोरायसिस रोग के लक्षण क्या होते हैं?

सोरायसिस एक ऐसी बीमारी है जो किसी भी जगह की त्वचा पर हो सकती है, लेकिन ये ज़्यादातर कोहनी, घुटने और पीठ पर होती है। सोरायसिस का असर सर की चमड़ी पर और नाखूनों में भी देखने को मिलता है। आइए, अब हम इसके कारणों पर नज़र डालते हैं।

  • त्वचा में लाल के चकत्ते (Rashes) होना।
  • शरीर में सफेद कलर की मोटी परत जमना।
  • चकतों में खुजली और लालपन (Redness) होना।
  • लाल रंग के चकतों का ज्यादातर घुटने और कोहनी के बाहरी भागों में होना।
  • सोरायसिस जहां पर होता है वहां पर खुजली के साथ-साथ दर्द का होना।
  • त्वचा में सुखापान (Dryness) आना और दरारें (Fissures) पड़ना
  • त्वचा का छिल जाना
  • त्वचा की चमड़ी की मोटाई (Thickness) का कम होना
  • त्वचा के ऊपर लाल रंग के पापड़ीदार उभरे हुए चकते बनना
  • जोड़ों का दर्द, सूजन या अकड़न आना
  • नाखूनों में असामान्यताएं, जैसे कि गड्ढेदार, बदरंग, या टेढ़े-मेढ़े नाखून होना।

सोरायसिस रोग किस उम्र के लोगों में होता है?

सोरायसिस यूँ तो अनुवांशिक रोग है, यह एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी में जाता है। जिन लोगों के माता पिता को यह बीमारी होती है, उन बच्चों में इसके होने की संभावना अधिक होती है। अगर हम उम्र की बात करे तो सोरायसिस 45 – 79 वर्ष की आयु वाले व्यक्तियों को होने की संभावना अधिक रहती है।

क्या आयुर्वेद में सोरायसिस रोग का उपचार किया जा सकता है? (Ayurvedic treatment for Psoriasis)

सोरायसिस के इलाज के लिए सबसे कारगर आयुर्वेदिक विधि पंचकर्म है। इसमें शरीर, त्वचा कोशिकाओं और दिमाग को शुद्ध करने के लिए शाकाहारी भोजन की सलाह दी जाती है। पंचकर्म चिकित्सा सोरायसिस के इलाज के लिए सरल आहार परिवर्तन का महत्व बताती है।

सोयरासिस के लिए आयुर्वेदिक जड़ी – बूटियां

सोयरासिस के इलाज के लिए हम इन जड़ी बूटियों को अपना सकते हैं।

गुडुची – निदान परिवर्जन में इसका उपयोग किया जाता है, जिससे यह रोग बढ़ता नहीं है और दोबारा नहीं होता है।
सरिवा – यह शरीर के तंत्रिका और परिसंचरण प्रणाली पर कार्य करती है।
हल्दी – यह त्वचा विकारों को दूर करने में मददग़ार है।
मंजिष्ठा – यह रक्तशोधन यानी खून की सफाई का कार्य करती है।

सोयरासिस में क्या नहीं खाना चाहिए ?

  • मैदा, चना, मटर, उड़द की दाल इत्यादि से परहेज करें खाद्य पदार्थों का परहेज करना चाहिए।
  • अधिक खट्टे फलों का ज्यादा सेवन करने से बचें
  • सब्जियों में सरसों, टमाटर, बैंगन, कंद-मूल को कम करें
  • दही, दूध, कोल्‍ड ड्रिंक का सीमित सेवन
  • तेल युक्त और मसालेदार भोजन नहीं करें
  • नॉनवेज का सेवन नहीं करें
  • नमक का कम उपयोग करें
  • चीनी का सिमित मात्रा में सेवन करें आदि।

उपरोक्त आर्टिकल में आपने सोयरासिस के बारे में विस्तार से जाना। यह आर्टिकल इंटरनेट पर उपलब्ध विभिन्न आर्टिकल्स के आधार पर लिखा गया और जानकारी मात्र के लिए है। अगर आप उपरोक्त में से कोई लक्षण महसूस करते हैं तो डॉक्टर को अवश्य दिखाएं।

क्या आयुर्वेद में फैटी लिवर ग्रेड 2 का पूर्णतः उपचार सम्भव है?

हम सभी को कभी न कभी पेट से जुड़ी समस्याएं तो अवश्य हुई होगी, इनमें कुछ समस्याएं ऐसी होती हैं जो सामान्य होती है और कुछ पर अगर ध्यान नहीं दिया जाए तो वह आगे चलकर गंभीर रूप भी ले सकती है।

जब भी पेट से जुड़ी समस्याओं पर बात करते हैं तब लिवर और ज़हरीले पदार्थों को पित्त के रूप में छानकर शरीर से अलग करता है। लीवर चयापचयों को detoxify करना, प्रोटीन को संश्लेषित करना, और पाचन के लिए आवश्यक जैव रासायनिक बनाने का कार्य भी करता है।

ऐसे हमें आप यह तो जान गए होंगे कि लिवर शरीर का एक प्रमुख अंग होने के साथ मानव शरीर की शरीर की सबसे बड़ी ग्रंथि है, जो पित्त (Bile) का निर्माण करती है। लेकिन कई बार स्वास्थ्य कारणों एवं खराब लाइफस्टाइल के कारण लिवर प्रभावित हो जाता है, जो स्वास्थ्य के लिए अच्छा संकेत नहीं है। इसी में एक अवस्था है फैटी लिवर।

फैटी लिवर रोग क्या है?

फैटी लिवर, जिसे हेपेटिक स्टीटोसिस भी कहा जाता है, एक ऐसी स्थिति है जिसमें लिवर बहुत अधिक वसा जमा हो जाती है। फैटी लिवर सीधे तौर पर कोई लक्षण पैदा नहीं कर सकता है, लेकिन यह महत्वपूर्ण स्वास्थ्य समस्याओं का कारण जरूर बन सकता है। ऐसी स्थिति को रोकने और सुधारने के लिए अपनी जीवनशैली में बदलाव करना महत्वपूर्ण है। फैटी लिवर विभिन्न कारकों से हो सकता है, जिनमें शराब का उपयोग, मोटापा और चयापचय संबंधी विकार शामिल हैं।

फैटी लिवर का अवलोकन

फैटी लिवर एक ऐसी स्थिति है जहां लिवर में वसा लीवर के वजन के 5% से 10% के स्तर तक जमा हो जाती है। वसा निर्माण के कारणों के आधार पर, वसायुक्त रोग की इस स्थिति को दो प्रकारों में वर्गीकृत किया जा सकता है:

गैर-एल्कोहलिक फैटी लिवर रोग: यह शराब के सेवन से जुड़ा नहीं है।

एल्कोहलिक फैटी लिवर रोग: एल्कोहलिक फैटी लिवर रोग, अत्यधिक मात्रा में शराब के उपयोग से जुड़ा हुआ है।

फैटी लिवर को वसा की उपस्थिति के आधार पर तीन श्रेणियों में वर्गीकृत किया गया है:

  • ग्रेड 1 इस श्रेणी अन्तर्गत लीवर में 5% से 33% वसा लीवर में जमा हो जाती है।
  • ग्रेड 2 इस श्रेणी अन्तर्गत लिवर में 34-66% वसा लिवर में जमा हो जाती है।
  • ग्रेड 3 यह गंभीर श्रेणी है, जिसमें 66% से अधिक वसा लिवर में जमा हो जाती है।

फैटी लिवर ग्रेड 2 के लक्षण क्या है?

फैटी लिवर, लिवर के फैटी होने के प्रभाव को प्रदर्शित करती एक ग्रेड है। ग्रेड 2 फैटी लिवर का अर्थ है लिवर में 34-66% वसा जमा हो गई है। हेल्थ आर्टिकल्स के अनुसार जब तक बीमारी सिरोसिस चरण तक नहीं पहुंच जाती, तब तक फैटी लिवर ग्रेड 2 में ज्यादातर कोई लक्षण नहीं दिखता है। कुछ लक्षण देखे जा सकते हैं, जो इस प्रकार हैं।

  • भूख में कमी
  • वजन घटना
  • उल्टी आना
  • पैर और पेट सूजे हुए दिखाई देना
  • थकावट और कमजोरी महसूस करना
  • त्वचा का रंग बदलकर पीला हो जाना
  • आंखों का सफेद भाग पीला पड़ना
  • पेट के ऊपरी दाहिनी ओर दर्द होना।

फैटी लिवर ग्रेड 2 का कारण क्या है?

  • स्वास्थ्य स्थितियां या बीमारियाँ
  • आनुवंशिक कारक
  • असंतुलित आहार
  • अधिक वजन या मोटापा
  • टाइप 2 मधुमेह
  • रक्त में वसा का असामान्य स्तर
  • स्टेरॉयड का सेवन करना
  • नींद संबंधी विकार
  • हेपेटाइटिस सी संक्रमण आदि।

फैटी लिवर ग्रेड 2 का इलाज क्या है?

फैटी लिवर ग्रेड 2 के लक्षण दिखने पर आपको चिकित्सकीय सलाह लेनी होती है। आपकी चिकित्सा स्थिति के आधार पर डॉक्टर लिवर फंक्शन टेस्ट कराने की सलाह देगा। जिसमें आपके लिवर के स्वास्थ्य की जांच की जाएगी।

इसके अलावा डॉक्टर आपको अन्य टेस्ट के लिए भी कह सकता है, जिसमें अल्ट्रासाउंड, एमआरआई स्कैन आदि शामिल हैं। अगर हम दवाओं की बात करें तो फैटी लिवर रोग के इलाज के लिए कोई खास दवा नहीं है, हालांकि डॉक्टर्स द्वारा लिखी कुछ दवाओं के माध्यम से इसकी स्थिति में सुधार जरूर किया जा सकता है। फैटी लिवर के इलाज के लिए जीवनशैली में बदलाव की सलाह जरूर दी जाती है।

यदि आपको चयापचय संबंधी फैटी लिवर रोग है, तो यह उपाय किए जा सकते हैं।

  • स्वस्थ एवं संतुलित आहार लें
  • चीनी का उपयोग कम करें
  • वजन नियंत्रित करें
  • नियमित रूप से व्यायाम करें
  • अपने रक्त शर्करा को नियंत्रित करें
  • उच्च कोलेस्ट्रॉल है तो उसका करवाएं
  • लिवर का प्रभावित करने वाली दवाओं से बचें
  • शराब एवं धूम्रपान का सेवन नहीं करें आदि।

लिवर ग्रेड 2 का आयुर्वेदिक इलाज क्या है?

अब हम फैटी लीवर ग्रेड 2 के उपचार के लिए आयुर्वेदिक उपायों पर बात करेंगे। आयुर्वेद में ऐसी कई जड़ी बुटियां और औषधियां मौजूद है, जो लिवर ग्रेड 2 के ​इलाज में मददगार साबित हो सकती है।

फैटी लिवर का आयुर्वेदिक इलाज है आंवला

विशेषज्ञों के अनुसार आंवला लिवर के लिए सबसे अच्छा है। आंवला लिवर की कार्यप्रणाली में सुधार करता है। आंवला लिवर में जमा गंदा फैट हटाता है। फैटी लिवर की समस्या से ग्रसित लोगों को रोजाना आंवला रस पीना चाहिए।

सुबह गुनगुना पानी पिएं

लिवर को हेल्दी एंड स्ट्रोंग बनाने के लिए रोजाना जल्दी सोना और जल्दी उठना चाहिए। साथ ही सुबह उठकर सबसे पहले 1-2 गिलास गुनगुना पानी अवश्य पिएं।

एलोवेरा जूस

एलोवरा जूस भी फैटी लिवर को बेहतर करने में बहुत मददगार है। एलोवेरा जूस का सेवन रक्त को शुद्ध करने और लीवर के कार्य को बढ़ावा देने में मदद करता है।

गन्ने जूस का सेवन

अगर आपको फैटी लिवर की समस्या है तो गन्ने के रस का सेवन करें। गन्ने के रस का सेवन भी फैटी लिवर में गंदगी को बाहर निकालने में मददगार है।

त्रिफला चूर्ण

त्रिफला चूर्ण बहुत ही फायदेमंद औषधी है। आयुर्वेदिक तरीकों से तैयार किया गया ये चूर्ण डाइजेशन को सही रखने में मददगार है। इसके साथ ही शरीर के टॉक्सिंस को बाहर निकालने और लीवर को खराब होने से भी बचाता है। त्रिफला में एंटी ऑक्सीडेंट और एंटी इंफ्लेमेटरी गुण पाए जाते हैं, जो लिवर के स्वास्थ्य के लाभकारी है।

अंडकोष कैंसर क्या होता है? जानें इसके लक्षण, कारण एवं आयुर्वेदिक उपचार

टेस्टिकुलर कैंसर (Testicular cancer) जिसे वृषण कैंसर या अंडकोष के कैंसर भी कहा जाता है। यह बीमारी पुरुषों को ही होती है, क्योंकि यह कैंसर अंडकोष का कैंसर होता है। इसलिए यह बेहद आवश्यक है कि पुरुष इसके बारे में जागरूक रहें।

यह कैंसर की गंभीर बीमारी जरूर है, लेकिन आपको इससे इतना घबराने की जरूरत नहीं है, वक्त पर यदि इसका पता चल जाए तो इसका इलाज संभव है।

अंडकोष कैंसर क्या होता है?

वृषण या अंडकोष कैंसर, अंडकोष में विकसित होता है, जिसे वृषण भी कहा जाता है, जो पुरुष प्रजनन प्रणाली का एक हिस्सा है। प्रत्येक पुरुष में दो अंडकोष होते हैं जो लिंग के ठीक नीचे अंडकोष की तरह एक थैली जैसी संरचना में मौजूद होते हैं। यह वृषण है जो शुक्राणुओं के उत्पादन और पुरुष सेक्स हार्मोन टेस्टोस्टेरोन को रिलीज करने का काम करता है। इन्हीं अंडकोष के भीतर वृषण कैंसर विकसित होता है। सबसे आम प्रकार के वृषण कैंसर शुक्राणु पैदा करने वाली कोशिकाओं में विकसित होते हैं, जिन्हें जर्म कोशिकाएं कहा जाता है।

अंडकोष कैंसर के लक्षण क्या है?

वृषण या अंडकोष कैंसर का आसानी से निदान संभव है, क्योंकि रोग के शुरुआती चरण में लक्षण दिखाई देते हैं। इस कैंसर के शुरुआती लक्षणों में एक अंडकोष में दर्द रहित गांठ या सूजन का होना शामिल है। वृषण कैंसर के अन्य लक्षण इस प्रकार है, जब वह जांघों में नहीं फैला हो।

  • अंडकोष या पेट के निचले हिस्से में भारीपन महसूस होना
  • अंडकोष में तरल पदार्थ का जमना
  • पीठ और पेट में दर्द महसूस होना
  • अंडकोष के आकार और बनावट में बदलाव

अन्य लक्षण जब वृषण कैंसर अन्य अंगों में फैल चुका हों, इसमें शामिल हैंः

  • कई मामलों में हार्मोनल बदलाव के कारण ब्रेस्ट विकसित होते हैं और दर्द होता है।
  • यदि यह फेफड़ों को प्रभावित करता है तो सांस लेने में भी दिक्कत होती है।
  • यदि कैंसर लिम्फ नोड तक फैल जाता है, तब लोअर बैक में दर्द होने की समस्या होने लगती है।
  • जब कैंसर लीवर में फैलता है, तब पेट में गंभीर दर्द होता है।
  • जब मस्तिष्क में कैंसर फैलता है, तब लगातार और कभी-कभी गंभीर सिर दर्द होता है।
  • हालांकि, कैंसर के उपचार के पूरा होने के बाद पूरी तरह से ठीक हो जाता है।

टेस्टिकुलर कैंसर के कारण

टेस्टिकुलर कैंसर या अंडकोष कैंसर के कारण अभी भी पूर्ण रूप से ज्ञात नहीं हो पाए हैं, लेकिन शोधकर्ताओं ने कुछ ऐसे कारकों, जिससे इस कैंसर को विकसित होने में सहायता मिल सकती है, उनकी पहचान की है जोकि इस प्रकार हैं:

उम्र: टेस्टिकुलर कैंसर युवा पुरुषों में अधिकतर पाया जाता है और विशेषतः यह 25 से 35 वर्ष की आयु के बीच वाले पुरूषों को अपनी चपेट में लेता है।

जेनेटिक कारण: परिवार में पुरुष को यह बीमारी यदि पहले हो चुकी है, तो संभव है कि यह कैंसर आगे भी उस परिवार के किसी अन्य पुरुष को हो सकता है।

क्रिप्टोर्चिडिज़्म (Cryptorchidism): क्रिप्टोर्चिडिज़्म का अर्थ है जन्म से पहले दोनों वृषण अंडकोश में नहीं उतरना। जिन पुरुषों में जन्म से पहले दोनों वृषण अंडकोश में नहीं उतरते हैं, ऐसे पुरुषों को भी वृषण कैंसर होने का ख़तरा अधिक होता है।

पूर्व में अनुभव: जिस किसी पुरुष को एक अंडकोष में वृषण कैंसर हो चुका है, उन्हें उनके दूसरे अंडकोष में भी यह कैंसर होने का ख़तरा बहुत अधिक होता है।

अंडकोष कैंसर का इलाज क्या है?

वृषण या अंडकोष कैंसर का उपचार भी अन्य कैंसर प्रकारों की तरह, कैंसर के चरण और उसके प्रकार पर निर्भर करता है। इस कैंसर के उपचार के विकल्पों में सर्जरी, रेडियोथेरेपी और कीमोथेरेपी आदि शामिल हैं।

अंडकोष कैंसर के उपचार में सबसे पहले आमतौर पर अंडग्रंथि की जाती है, जिसमें ऑपरेशन की मदद से प्रभावित वृषण को हटाया जाता है और यह कार्सिनोमा-इन-सीटू के मामलों में किया जाता है, जहां कैंसर अंडकोष के बाहर नहीं फैला है।

सर्जरी: वृषण या अंडकोष कैंसर में प्रभावित अंडकोष को हटाने के लिए ऑर्किएक्टॉमी सर्जिकल प्रोसीजर किया जाता है। इसके अन्तर्गत कुछ केसेस में कैंसर को फैलने से रोकने के लिए पेट में लिम्फ नोड्स को रेट्रोपेरिटोनियल लिम्फ नोड विच्छेदन सर्जिकल प्रोसीजर के माध्यम से हटाया जाता है। सर्जरी का उपयोग वृषण या अंडकोष कैंसर में प्राथमिक उपचार के रूप में किया जाता है।

रेडिएशन थेरेपी: इस थेरेपी में, ऊर्जा एक्स-रे का उपयोग कैंसर कोशिकाओं को नष्ट करने और ट्यूमर को सिकोड़ने के लिए किया जाता है। शरीर में बचे हुए कैंसर सेल्स को ख़त्म करने के लिए इस विकल्प का उपयोग सर्जरी के बाद किया जाता है। इसके अलावा रेडिएशन थेरेपी का उपयोग सेमिनोमा जैसे वृषण कैंसर के केसेस में भी किया जाता है।

सेमिनोमा : इस प्रक्रिया में प्रभावित अंडकोष पूरी तरह सर्जरी से हटा दिया जाता है। सर्जरी के बाद अन्य उपचारों का उपयोग किया जा सकता है।

कीमोथेरेपीः यह एक ऐसा विकल्प है, जो सर्जरी के बाद दवा कार्बोप्लैटिन के साथ कीमो की 1 या 2 साइकिल पर काम करता है। कई विशेषज्ञ विकिरण पर कीमो पसंद करते हैं क्योंकि इसे सहन करना आसान होता है।

अंडकोष कैंसर का आयुर्वेदिक उपचार क्या है?

वृषण या अंडकोष कैंसर, अंडकोष में विकसित होता है, जो अंडकोष में स्थित पुरुष प्रजनन ग्रंथियां हैं। अंडकोष कैंसर उन कोशिकाओं में शुरू होता है जो शुक्राणु उत्पन्न करते हैं, जिन्हें जर्म कोशिकाओं के रूप में भी जाना जाता है, लेकिन यह उन कोशिकाओं में भी शुरू हो सकता है, जो अंडकोष में हार्मोन उत्पन्न करती हैं। यह एक गंभीर स्थिति है जिसका इलाज आयुर्वेदिक तरीकों से भी किया जा सकता है।

अश्वगंधा

यह जड़ी बूटी प्रतिरक्षा-बढ़ाने वाले गुणों के लिए जानी जाती है। इसमें कैंसर रोधी गुण भी हो सकते हैं और कीमोथेरेपी के दुष्प्रभावों को कम करने और वृषण कैंसर के लक्षणों का इलाज करने में मदद कर सकते हैं।

सहजन

कहा जाता है कि मोरिंगा ओलीफ़ेरा में कुछ कैंसर-रोधी गुण हो सकते हैं, कैंसर कोशिकाओं पर इसके प्रभावों को पूरी तरह से समझने के लिए और अधिक शोध की आवश्यकता है। यह प्रभावित क्षेत्र के आसपास के प्रभाव को कम करके वृषण कैंसर का इलाज और सूजन को कम करने में मदद करता है।

तुलसी

तुलसी एक शक्तिशाली एंटीऑक्सीडेंट है और वृषण या अंडकोष कैंसर के कारण शरीर में सूजन और तनाव को कम करने में मदद कर सकता है। इसमें कैंसर रोधी गुण भी होते हैं, और यह प्रतिरक्षा प्रणाली को बेहतर बनाने में मदद कर सकता है।

नसों में जम गए हैं खून के थक्के, आज ही अपनाएं ये 5 आयुर्वेदिक उपाय

आज के समय में लोगों की ख़राब लाइफस्टाइल और खानपान ने उन्हें कई बीमारियों से घेर लिया है। इसके कारण वजन और मोटापा दोनों बढ़ने लगते हैं जो आपके शरीर में कई समस्याएं पैदा करते हैं। बात जब स्वास्थ्य और फिटनेस की आती है, तो अक्सर हम जो भी खाते हैं, उसी के साथ रहते हैं और ये नहीं ध्यान देते कि हम कैसे खा रहे हैं। ऐसे में कई बार ये गलत खानपान ही शरीर में बीमारियों को प्रवेश करने देता है। कई बीमारियों को तो इतने पैसे खर्च करने के बाद भी पूरी तरह से ठीक नहीं किया जा सकता। इन बीमारियों को बस कंट्रोल में ही रखा जा सकता है, जैसे- डायबिटीज़, मोटापा और बीपी। लेकिन इन दिनों हर दूसरे व्यक्ति को एक और समस्या जकड़ रही है और उसका नाम है ब्लड क्लॉट यानी खून का थक्का।

वैसे तो खून का थक्का बनना या ब्लड क्लॉटिंग हमारे शरीर के लिए वैसे तो फायदेमंद होता है। लेकिन यदि ये क्लॉटिंग शरीर के अंदर नसों में बननी शुरू हो जाए तो ये जानलेवा साबित हो सकती है। अगर आप भी इस बीमारी की चपेट में आ चुके हैं और डॉक्टर की मंहगी फीस और दवाइयों में अब और ज्यादा पैसे नहीं खर्च करना चाहते, तो चिंता मत कीजिए, क्योंकि हम आपको आज ब्लड क्लॉट के आयुर्वेदिक इलाज के बारे में बता रहे हैं। जी हां, आयुर्वेद में हर बीमारी का सटीक इलाज मौजूद है। ऐसे में हम आपको इस आर्टिकल में जो हेल्थ टिप्स दे रहे हैं, उन्हें आप आज से ही फॉलो करना शुरू कर दें।

ब्लड क्लॉट क्या होता है?

हमारे शरीर में रक्त वाहिनियों के जरिए खून दिल तक पहुंचता है और साथ ही ये पंपिंग के जरिए साफ होते हुए शरीर के अन्य अंगों तक पहुँचता है। इसी बहते खून में कभी-कभी क्लॉट यानी थक्का बन जाता है। लेकिन जब ये खून के थक्के लंबे समय तक बने रहते हैं तो ये सेहत के लिए हानिकारक साबित हो सकते हैं। यदि लंबे समय तक इन ब्लड क्लॉट्स का इलाज नहीं किया जाए तो ये थक्के धमनियों या नसों में चले जाते हैं और फिर ये शरीर के किसी भी हिस्से जैसे आंख, दिल, दिमाग, फेफड़े और किडनी आदि में पहुंच उन अंगों के काम को बाधित कर देते हैं। वैसे तो खून के थक्के जमना कई बार शरीर के लिए अच्छा भी रहता है। दरअसल, जब अपने आप ब्लड क्लॉट बनते हैं तो ये क्षतिग्रस्त नलिकाओं की मरम्मत करने का भी काम करते हैं। यदि ये थक्के ना बने तो चोट लगने पर शरीर में खून का बहाव रोकना बहुत ही मुश्किल हो जायेगा। शरीर में मौजूद प्लाज्मा में कई प्लेटलेट्स और प्रोटीन होते हैं जो चोट की जगह पर रक्त के थक्के निर्माण करते हैं और खून बहने से रोकते हैं। लेकिन जब ये क्लॉटिंग शरीर के अंदर नसों में होने लगती है तो खतरनाक साबित हो सकती है। इस तरह का खून का थक्का हमेशा ही अपने आप या प्राकृतिक रूप से घुलकर वापस खून में परिवर्तित नहीं होता।

कितने प्रकार के होते हैं ब्लड क्लॉट?

आमतौर पर ब्लड क्लॉट दो प्रकार के होते हैं। पहला जिसमें लगातार खून बहता है और उस जगह के खून के थक्के नहीं जमते हैं और दूसरा अप्रत्याशित तरीके से खून का थक्का जमने लगना जिसे थ्रॉम्बोसिस भी कहते हैं। ये समस्या नसों में हो सकती है। कई बार ये खून के थक्के रक्त वाहिकाओं को भी ब्लॉक कर सकते हैं, जिसके कारण शरीर में गंभीर परेशानी उत्पन्न हो सकती है। जब ब्लड क्लॉटिंग ब्रेन में होती है तो इसे ब्रेन स्ट्रोक कहते हैं। इसके कारण सिर में अचानक से बेहद तेज दर्द होता है।

हाथ या पैर में क्लॉट

जब भी कभी हाथ या पैर में कोई चोट लग जाती या किसी चीज से टकरा जाते हैं तो स्किन में ब्लड जमा हो जाता है। फिर उस जगह पर हल्की सी सूजन आ जाती है और ब्लड जमने से डार्क ब्राउन कलर हो जाता है। इस ब्लड क्लॉट को नजरअंदाज न करें क्योंकि ये आपके दिल या लंग्स तक पहुंचकर आपको नुकसान पहुंचा सकता है।

हार्ट में क्लॉट

कई बार खून के थक्के हार्ट तक पहुँच जाते हैं। ऐसे में सीने में तेज दर्द होता है, पसीना आने लगता है और साथ ही सांस लेने में तकलीफ होती है। ये सभी हार्ट में ब्लॉक के लक्षण होते हैं। इससे हार्ट अटैक आने का खतरा रहता है।

अन्य क्लॉट

हाथ-पैर में होने वाले सामान्य क्लॉट कई बार पूरी बॉडी में ट्रेवल करके लंग्स तक पहुँच सकते हैं। साथ ही पेट में इंटेस्टाइन से ब्लड ड्रेन करने वाली नर्वस से भी क्लॉट हो सकते हैं, जो शरीर के लिए खतरनाक साबित हो सकते हैं। ऐसे में यदि पेट में लगातार दर्द होता है, तो एक बार जांच जरूर करवा लें।

क्या ब्लड क्लॉट होने से जा सकती है जान?

जी हां, दरअसल, की बार ब्लड क्लॉट साइलेंट किलर का काम करता है। ये शरीर में ऐसी गंभीर मेडिकल कंडीशन पैदा कर देता है, जिसके कारण व्यक्ति डर-सा जाता है। कई बार धूम्रपान, शराब का सेवन, तंबाकू का सेवन, हाई ब्लड प्रेशर और एस्ट्रोजन जैसी कुछ दवाएं खून जमने के जोखिम को बढ़ा देती है। यदि ब्लड क्लॉट के लक्षणों को पहले ही पहचान लिया जाए तो व्यक्ति की जान जाने से बच सकती है।

ब्लड क्लॉट के लक्षण क्या हैं?

  • बहुत ज्यादा पसीना आना
  • घबराहट होना
  • कमजोरी महसूस करना
  • बार-बार हाथ-पैर सुन्न होने लगना
  • चलने में परेशानी होना
  • सिर घुमना
  • चक्कर आना
  • शरीर मोटापे का शिकार होना
  • पीरियड्स बंद यानि मेनोपॉज होना
  • सांस फूलना
  • सांस लेने में दिक्कत आदि

ब्लड क्लॉट का आयुर्वेदिक इलाज क्या है?

आयुर्वेद में हर बड़ी से बड़ी बीमारी का इलाज बताया गया है। इसी तरह ब्लड क्लॉट की समस्या का भी इलाज आयुर्वेद के पास मौजूद है। भले ही आयुर्वेदिक चिकित्सा को असर करने में समय लगता है लेकिन यह लंबे समय तक प्रभावी रहती है। साथ ही इससे शरीर में कोई साइड इफ़ेक्ट भी नहीं होते हैं। तो चलिए जानते हैं ब्लड क्लॉट के आयुर्वेदिक इलाज के बारे में।

  • ब्लड क्लॉट को खत्म करने के लिए मेधा क्वाथ का काढ़ा बनाकर सुबह-शाम पीएं।
  • चिराजीत रसायन वटी की 1 गोली रोजाना खाएं।
  • साथ ही रोजाना एक गोली अश्वगंधा वटी खाएं।
  • हद्याअमृत दिन में 2-3 बार सेवन करे।
  • गौधन अर्क को सुबह-सुबह 2 चम्मच पिएं। अगर आपको ऐसे अच्छा नहीं लग रहा है तो इसमें 1 चम्मच शहद मिलाकर पी सकते हैं।
  • रात को पानी में 4-5 लहसुन की कलियाँ भिगोकर रख दें और सुबह उठकर इसका सेवन कर लें।
  • लहसुन, प्याज, हल्दी, एलोवेरा लें और इसे धीमी आंच में पका लें। फिर आप रोजाना इसे एक चम्मच शहद में मिलाकर खा लें।
  • आप रोज लौकी के जूस का भी सेवन कर सकते हैं। इसके अलावा आप लौकी का सूप और सब्जी का सेवन करे।
  • रोजाना अर्जुन की छाल और दालचीनी का काढ़ा बनाकर थोड़ा-थोड़ा पिएं।
  • रोजाना अनार का सेवन करें।

Pavtan Pavtan
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